अनहद नाद

May 19, 2008

कविता-फविता फाड़ै थीं

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 7:12 am

मृणाल पाण्डे

मृणाल पाण्डे की एक कविता

 

अल्मोड़ा-साहित्य ३

 

हरी ‘व्यथित’  औ’  नरी ‘अकेला’ कभूं कभूं

लब खोलै थे,

जब जब धीयां पास गुजरतां, ‘मर गए जानी’

बोलै  थे ॥

 

हरित ‘सशंक’  औ’  मोहन हुड़किया सबकी

अपनी थी औकात,

अपने-अपने छंद छतरपति बन बन होली खेलैं

थे ॥

 

फितरत उनकी ‘पंत’ , ‘निराला’ , किस्मत उनकी

क्लर्काई ,

खुदै लिखैं औ’ खुदै छपाएं , खुदै उसी पै बोलै

थे ॥

 

घर की बहुआं कभी-कभी जब बैठक कमरा

झाड़ै थीं ,

मार झपाका गड्डी-गड्डी कविता-फविता फाड़ै

थीं ॥

 

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( तीन कविताओं की  सीरीज़  की अंतिम कड़ी; जनसत्ता सबरंग, 05 अगस्त 2001 से साभार )

 

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