अष्टभुजा शुक्ल की एक कविता
सहमति
भाग रहा हूं निपट अकेला
खोज रहा उस साथी को
दोनों हाथों में सहमति हो
तो कस लेंगे हाथी को ।
*****
काव्य संकलन ‘दुःस्वप्न भी आते हैं’ से साभार
तस्वीर : प्रभात खबर से साभार
अष्टभुजा शुक्ल की एक कविता
सहमति
भाग रहा हूं निपट अकेला
खोज रहा उस साथी को
दोनों हाथों में सहमति हो
तो कस लेंगे हाथी को ।
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काव्य संकलन ‘दुःस्वप्न भी आते हैं’ से साभार
तस्वीर : प्रभात खबर से साभार
Posted in कविताएं/Poems | Tags: अष्टभुजा शुक्ल
वाह !
By: प्रत्यक्षा on June 16, 2008
at 10:39 am
क्या पण्डितजी, यहां सहमति अपने से न बन पाई! हाथी तो क्या अपनी हथेली भी न कस पा रहे!
पर शुक्ल जी की कविता जानदार है।
By: Gyan Dutt Pandey on June 16, 2008
at 10:58 am
अच्छी कविता है।
By: अशोक पाण्डेय on June 16, 2008
at 11:13 am
छोटी लेकिन महत्वपूर्ण कविता. याद रह जाने वाली.
By: विजय गौड on June 16, 2008
at 12:26 pm
कविता छोटी व सुन्दर है. अर्थपूर्ण है.
याद रह जाने वाली बताया गया है…सावधान कहीं चुनावी नारे के रूप में न प्रयोग हो जाये…कस लेंगे हाथी को…
By: संजय बेंगाणी on June 16, 2008
at 1:21 pm
By: parul on June 16, 2008
at 3:18 pm
बहुत उम्दा..
By: समीर लाल on June 16, 2008
at 3:22 pm
bahut badhiya bahut achhi lagi choti magar badi baat kehti kavita sundar
By: mehhekk on June 16, 2008
at 5:12 pm
वाह भाई अष्ट भुजा जी की अच्छी कविता…अच्छी फोटो….सब अच्छा है…
By: बोधिसत्व on June 17, 2008
at 12:28 pm