Posted by: PRIYANKAR | June 16, 2008

सहमति

अष्टभुजा शुक्ल की एक कविता

 

सहमति

 

भाग रहा हूं निपट अकेला

खोज रहा   उस साथी को

दोनों हाथों में सहमति हो

तो कस लेंगे   हाथी को ।

 

*****

 

काव्य संकलन ‘दुःस्वप्न भी आते हैं’ से साभार

तस्वीर : प्रभात खबर से साभार

 


Responses

  1. वाह !

  2. क्या पण्डितजी, यहां सहमति अपने से न बन पाई! हाथी तो क्या अपनी हथेली भी न कस पा रहे!
    पर शुक्ल जी की कविता जानदार है।

  3. अच्‍छी कविता है।

  4. छोटी लेकिन महत्वपूर्ण कविता. याद रह जाने वाली.

  5. कविता छोटी व सुन्दर है. अर्थपूर्ण है.

    याद रह जाने वाली बताया गया है…सावधान कहीं चुनावी नारे के रूप में न प्रयोग हो जाये…कस लेंगे हाथी को… :)

  6. :) achhii lagii..

  7. बहुत उम्दा..

  8. bahut badhiya bahut achhi lagi choti magar badi baat kehti kavita sundar

  9. वाह भाई अष्ट भुजा जी की अच्छी कविता…अच्छी फोटो….सब अच्छा है…


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