Posted by: PRIYANKAR | July 1, 2008

अहमद फ़राज़ का एक शे’र

(यात्रा-साहित्य पर केन्द्रित समकालीन सृजन के अंक ‘यात्राओं का जिक्र’ के प्रकाशन के बाद उर्दू शे’र-ओ-शायरी पर केन्द्रित संकलन/कोश पर काम शुरू किया है . इसी क्रम में प्रस्तुत है एक शे’र  :

 

शायद कोई …..

 

शायद कोई ख्वाहिश रोती रहती है

मेरे अन्दर बारिश होती रहती है ।

 

*****

 


Responses

  1. बढ़िया शेर छांट के लाये हैं आप. शुक्रिया.

  2. ओह !

  3. खूब

  4. अब तुलनात्मक रूप से देखें तो हमारे अन्दर ओरी (बारिश का पानी जो छत से परनाले के रूप में आता है) बहती है!

  5. बहुत बढिया , सधा हुआ शेर है !

  6. बाहर तो बारिश हो ही रही थी, आपने अंदर भी करा दी। बहुत खूब।

  7. इस शेर का जवाब
    बारिशें छत पर खुली जगहों पर होती हैं लेकिन
    गम वो सावन है जो बंद कमरों के अंदर बरसे ।।

  8. चलिए फराज़ के कुछ अशआर मेरी जानिब से…
    दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें
    दिल भी माना नहीं कि तुझसे कहें

    आज तक अपनी बेकली का सबब
    खुद भी जाना नहीं कि तुझसे कहें

  9. अहमद फ़राज़ साहब के एक शेर में समा बांध दिया. वाह!!

  10. एक शेर पूरी बारिश पर भारी है। इधर अनवरत देखिए। पुरुषोत्तम यकीन की पूरी गजल है वहाँ।

  11. wah kya kehne
    शायद कोई ख्वाहिश रोती रहती है

    मेरे अन्दर बारिश होती रहती है ।

    mubarak ho- jindgi ka yahi sachcha falsafa hota hai
    khawahish/aarzoo/hasrat/ummeed

  12. abhi to khushq hai mausam, jo baarish ho to sochenge
    hamein apne armaanon ko kis mitti mein bona hai.

  13. Мне не очень


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