Posted by: PRIYANKAR | July 3, 2008

कोई याद आता है निषिद्ध !

इन दिनों का रंग

बोधिसत्व की एक कविता

 

निषिद्ध

 

कोई याद आता है

आरती के समय

भोग लगाते समय

जलाभिषेक के समय

नींद के समय

कभी-कभी एकदम रात में

जब घंटियां रो रही होती हैं पूजा की

जब शंख भीतर ही भीतर

सुबक रहे होते हैं

कोई याद आता है, निषिद्ध !

 

****

 


Responses

  1. सुंदर रचना।

  2. पहचान कौन?

    मित्र बोधि की गम्भीर कविता से मज़ाक करने की आज़ादी ले रहा हूँ..

  3. सुंदर कविता है। आपका चिट्ठा अच्‍छी कविताओं के पठन-पाठन का अड्डा साबित हो रहा है।

  4. जी !

  5. अच्छी लगी कविता …धन्यवाद

  6. वाह ! बहुत बढ़िया. शुक्रिया.

  7. वाह!! बोधि भाई की जय, उम्दा रचना. प्रियंकर जी का आभार.

  8. पहचान लिए! जिन को पण्डित जी दोने में भर रोज मंदिर के बाहर प्रसाद पहुँचाते थे, और देने जाना होता था मुझे। दोनों ही मजबूर थे। बीच में दोनों को अलग करने वाली समाज की दीवारें खड़ी थीं।

  9. सुंदर!!!!

  10. सच में, यह कवि ही है जो शंख के सुबुकने की आवाज सुन लेता है। हमें तो न शोर सुनाई देता है, न सन्नाटा।
    अच्छी लगी कविता।


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