Posted by: PRIYANKAR | July 9, 2008

साफ़-साफ़

ashtabhuja shukla

अष्टभुजा शुक्ल की एक कविता

 

साफ़-साफ़

 

जो रोशनी में खड़े होते हैं वे

अंधेरे में खड़े लोगों को

तो देख भी नहीं सकते

 

लेकिन अंधेरे  के खड़े लोग

रोशनी में खड़े लोगों को

देखते रहते हैं साफ़-साफ़ ।

 

****

 

 काव्य संकलन ‘दुःस्वप्न भी आते हैं’ से साभार

 तस्वीर : प्रभात खबर से साभार


Responses

  1. सीधी सच्ची बात…बिना लाग लपेट के.
    नीरज

  2. बिलकुल साफ साफ,
    लेकिन जैसे ही वे
    प्रवेश करते हैं
    रोशनी के दायरे में
    उन्हें भी दिखाई देना
    बंद हो जाते हैं
    अंधेरे में खड़े लोग।

  3. सही है; अंधेरे की अच्छाइयां भी हैं।

  4. शायद इसीलिए सबको,या कम से कम उनको जिनका काम अंधेरों में रहने वालों का ध्यान रखना हो, थोड़ी देर तो अंधेरे में खड़ा होना ही चाहिए।
    घुघूती बासूती

  5. सादी, सच्ची और गहरी रचना..

    ***राजीव रंजन प्रसाद

  6. सुंदर रचना….बधाई


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