Posted by: PRIYANKAR | July 22, 2008

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पाश की एक बहुचर्चित कविता

 

सबसे ख़तरनाक

 

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

 
   

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Responses

  1. पाश कौन हैं नहीं पता (और न पता होने का मलाल हो रहा है); पर इस कविता से पूर्ण सहमत हुये बिना नहीं रह सकता। पूरी तरह सहमत!

  2. बहुत अच्छी रचना है।

  3. “सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
    तड़प का न होना
    सब कुछ सहन कर जाना”

    जब भी इन शब्दों को पढ़ता हूं, निशब्द हो जाता हूं.

  4. सर्वकालिक अद्भुत कविता. यह कविता हमारी धरोहर है भाई.

  5. बहुत अच्छी रचना-अद्भुत!!

  6. अनगिनत बार पढ़ने-सुनने के बावजूद हर बार इस कविता के अर्थ ज्‍़यादा मुखर होकर क्‍यों सामने आते हैं….।

  7. behtareen

  8. अरे! ज्ञानदत्त जी पाश को नहीं जानते। आप से शिकायत है कि आप कवियों का परिचय भी कविता के साथ दीजिए।

  9. main is rachna ke samne nishabad ho jati hun…dil ko jhinjhor dene wali rachna hai ye pash ki…pani men aag laga dene wali….

  10. yahi july ka maheena tha aur varsh tha 1984 paash ki rachnaon se pahala prichay….aur aaj tak bachaye huye hoon sapno ko marnese!thanx recharge hua !

  11. Thank you for posting this poem in Hindi. You can read Paash’s complete poetry in Punjabi and other languages at my blog http://paash.wordpress.com. It has a number of links to his poetry in other languages and his life and times anfd photo gallery and a lot more.


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