अनामिका की एक कविता
स्त्रियां
पढ़ा गया हमको
जैसे पढ़ा जाता है काग़ज
बच्चों की फटी कॉपियों का
‘चनाजोरगरम’ के लिफ़ाफ़े के बनने से पहले
देखा गया हमको
जैसे कि कुफ्त हो उनींदे
देखी जाती है कलाई घड़ी
अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद
सुना गया हमको
यों ही उड़ते मन से
जैसे सुने जाते हैं फ़िल्मी गाने
सस्ते कैसेटों पर
ठसाठस्स ठुंसी हुई बस में
भोगा गया हमको
बहुत दूर के रिश्तेदारों के दुख की तरह
एक दिन हमने कहा ––
हम भी इंसान हैं
हमें क़ायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर
जैसे पढ़ा होगा बी.ए. के बाद
नौकरी का पहला विज्ञापन
देखो तो ऐसे
जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है
बहुत दूर जलती हुई आग
सुनो, हमें अनहद की तरह
और समझो जैसे समझी जाती है
नई-नई सीखी हुई भाषा
इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई
एक अदृश्य टहनी से
टिड्डियाँ उड़ीं और रंगीन अफ़वाहें
चीखती हुई चीं-चीं
‘दुश्चरित्र महिलाएं, दुश्चरित्र महिलाएं ––
किन्हीं सरपरस्तों के दम पर फूली-फैलीं
अगरधत्त जंगल लताएं !
खाती-पीती, सुख से ऊबी
और बेकार-बेचैन, अवारा महिलाओं का ही
शग़ल हैं ये कहानियाँ और कविताएँ
फिर, ये उन्होंने थोड़े ही लिखीं हैं’
(कनखियाँ इशारे, फिर कनखी)
बाक़ी कहानी बस कनखी है
हे परमपिताओ,
परमपुरुषो ––
बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो !
****
सुंदरतम और यथार्थ।
By: प्रभाकर पाण्डेय on July 28, 2008
at 9:05 am
is kavita ko naari kavita blog par daalney kii anumati kissaey milaegee
By: rachna on July 28, 2008
at 9:55 am
अच्छा लिखा है।
By: ritu bansal on July 28, 2008
at 11:47 am
बहुत खूब ! बहुत सही !
By: sujata on July 28, 2008
at 12:22 pm
achchi hai
By: vipinjain on July 28, 2008
at 2:08 pm
अनामिका जी कविताएं हमेशा बाँध देती है…
By: Dr Anurag on July 28, 2008
at 2:09 pm
kya baat hai!!!aabhaar
By: parul on July 28, 2008
at 2:16 pm
Anamika ji, Baat to aap thik kahti hain, par kavita likhna kab seekhengi? Aap to bas begaar si kaati hui lagti hain–jayse ki jaldi se kavita se pind chhoote to chain ki sans len!
By: Namdhari Singh on July 28, 2008
at 5:31 pm
बहुत उम्दा!!
By: sameerlal on July 28, 2008
at 5:32 pm