Posted by: PRIYANKAR | August 6, 2008

जड़ें

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक कविता

 

जड़ें

 

जड़ें कितनी गहरीं हैं
आँकोगी कैसे ?
फूल से ?
फल से ?
छाया से ?
उसका पता तो इसी से चलेगा
आकाश की कितनी
ऊँचाई हमने नापी है
धरती पर कितनी दूर तक
बाँहें पसारी हैं।

 
जलहीन सूखी पथरीली
ज़मीन पर खड़ा रहकर भी
जो हरा है
उसी की जड़ें गहरी हैं
वही सर्वाधिक प्यार से भरा है।

 

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Responses

  1. जलहीन सूखी पथरीली
    ज़मीन पर खड़ा रहकर भी
    जो हरा है
    उसी की जड़ें गहरी हैं
    वही सर्वाधिक प्यार से भरा है।
    बहुत अच्छा लिखा है।बधाई स्वीकारें।

  2. बहुत सुंदर. पथरीली ज़मीन पर जड़ें सब से नहीं जमेंगी.

  3. इतनी सुंदर कविता पढ़ाने के लिए आभार।


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