अनामिका की एक और कविता
एक औरत का पहला राजकीय प्रवास
वह होटल के कमरे में दाख़िल हुई
अपने अकेलेपन से उसने
बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया
कमरे में अंधेरा था
घुप्प अंधेरा था कुएँ का
उसके भीतर भी !
सारी दीवारें टटोली अंधेरे में
लेकिन ‘स्विच’ कहीं नहीं था
पूरा खुला था दरवाज़ा
बरामदे की रोशनी से ही काम चल रहा था
सामने से गुजरा जो ‘बेयरा’ तो
आर्त्तभाव से उसे देखा
उसने उलझन समझी और
बाहर खड़े-ही-खड़े
दरवाजा बंद कर दिया
जैसे ही दरवाजा बंद हुआ
बल्बों में रोशनी के खिल गए सहस्रदल कमल !
“भला बंद होने से रोशनी का क्या है रिश्ता ?” उसने सोचा
डनलप पर लेटी
चटाई चुभी घर की, अंदर कहीं–- रीढ़ के भीतर !
तो क्या एक राजकुमारी ही होती है हर औरत ?
सात गलीचों के भीतर भी
उसको चुभ जाता है
कोई मटरदाना आदिम स्मृतियों का ?
पढ़ने को बहुत-कुछ धरा था
पर उसने बांची टेलीफोन तालिका
और जानना चाहा
अंतरराष्ट्रीय दूरभाष का ठीक-ठीक ख़र्चा
फिर, अपने सब डॉलर ख़र्च करके
उसने किए तीन अलग-अलग कॉल
सबसे पहले अपने बच्चे से कहा–-
“हैलो-हैलो, बेटे–-
पैकिंग के वक्त… सूटकेस में ही तुम ऊंघ गए थे कैसे…
सबसे ज़्यादा याद आ रही है तुम्हारी
तुम हो मेरे सबसे प्यारे !”
अंतिम दो पंक्तियाँ अलग-अलग उसने कहीं
आफिस में खिन्न बैठे अंट-शंट सोचते अपने प्रिय से
फिर, चौके में चिन्तित, बर्तन खटकाती अपनी माँ से
… अब उसकी हुई गिरफ़्तारी
पेशी हुई ख़ुदा के सामने
कि इसी एक ज़ुबाँ से उसने
तीन-तीन लोगों से कैसे यह कहा
–- “सबसे ज्यादा तुम हो प्यारे !”
यह तो सरासर है धोखा
सबसे ज्यादा माने सबसे ज्यादा !
लेकिन, ख़ुदा ने कलम रख दी
और कहा–-
“औरत है, उसने यह ग़लत नहीं कहा !”
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बेहद खूबसूरत…
बहुत ही सुंदर.
प्यारा गीत. अच्छा लगा पढ़ कर.
By: balkishan on अगस्त 7, 2008
at 6:28 पूर्वाह्न
bahut achchi….
bahut sundar….
By: vipin on अगस्त 7, 2008
at 6:42 पूर्वाह्न
लेकिन, ख़ुदा ने कलम रख दी
और कहा–-
“औरत है, उसने यह ग़लत नहीं कहा
बहुत सुन्दर लिखा है। सरल शब्दों में जीवन का सम्पूर्ण निचोड़ रख दिया। बधाई
By: ritu bansal on अगस्त 7, 2008
at 11:14 पूर्वाह्न
waah! kitna sach!!
By: parul on अगस्त 7, 2008
at 4:52 अपराह्न
क्या बात है. How true. Almost so blatant and yet not quite … Beautiful.
By: MEET on अगस्त 7, 2008
at 6:18 अपराह्न
प्रियंकरजी, अनहद-नाद पर एक टिप्पणी लिखी है। फुरसत से एक नजर मारिएगा। लिंक दे रहा हूं।
http://hindi.webdunia.com/samayik/article/article/0808/07/1080807081_1.htm
By: रवींद्र व्यास on अगस्त 8, 2008
at 12:25 अपराह्न
vahut hi sunder our komal rachana………vilkul ek ourat ke man ki hi tarah.
By: sampoorna pokhriyal on मई 30, 2009
at 8:47 पूर्वाह्न
बहुत खूब…
By: rahulsatunaahul satuna on फ़रवरी 21, 2012
at 3:45 पूर्वाह्न