Posted by: PRIYANKAR | August 11, 2008

प्रवास

रमेशचंद्र शाह की एक कविता

 

प्रवास

 

छूट गया पीछे वह सब कुछ

बांधे था जो अभी-अभी तक

टूट रही हर क्षितिज-अर्गला

कांधे अपने पहुंच सभी तक

 

एक दौड़ती खिड़की   के बल

फांद रहा  यह मन  उतना ही

मैं प्रवास में हूं–  यह खुद को

समझाता हूं   मैं   जितना ही

 

पंख पंख हैं, पांव  पांव हैं

उड़-उड़ आते नगर-गांव हैं

“आशा की माधुरी अवधि”…

गंतव्य सरीखे सभी ठांव हैं

 

लौटूंगा जब इसी वक्त कल

इसी रास्ते….  जैसा है तय

आगे जो भी है, अभी– वही सब

पीछे ही पीछे   होगा लय ।

 

*****

 

( समकालीन सृजन के अंक  ‘यात्राओं का ज़िक्र’  से साभार )


Responses

  1. लौटूंगा जब इसी वक्त कल

    इसी रास्ते…. जैसा है तय

    आगे जो भी है, अभी– वही सब

    पीछे ही पीछे होगा लय ।
    बहुत सुन्दर कविता। बधाई स्वीकारें।

  2. लौटूंगा जब इसी वक्त कल

    इसी रास्ते…. जैसा है तय

    आगे जो भी है, अभी– वही सब

    पीछे ही पीछे होगा लय ।

    शुक्रिया इस खूबसूरत कविता को यहाँ बांटने के लिये……

  3. सुन्दर कविता…

  4. शुक्रिया. इस खूबसूरत कविता को यहाँ बांटने के लिये.


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