अनहद नाद

August 12, 2008

यात्रा

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 10:34 am

एकांत श्रीवास्तव की एक कविता

 

यात्रा

 

नदियां थीं हमारे रास्ते में

जिन्हें बार-बार पार करना था

 

एक सूर्य था

जो डूबता नहीं था

जैसे सोचता हो कि उसके बाद

हमारा क्या होगा

 

एक जंगल था

नवम्बर की धूप में नहाया हुआ

कुछ फूल थे

हमें जिनके नाम नहीं मालूम थे

 

एक खेत था

धान का

पका

जो धारदार हंसिया के स्पर्श से

होता था प्रसन्न

 

एक नीली चिड़िया थी

आंवले की झुकी हुई टहनी से

अब उड़ने को तैयार

 

हम थे

बातों की पुरानी पोटलियां खोलते

अपनी भूख और थकान और नींद से लड़ते

धूल थी लगातार उड़ती हुई

जो हमारी मुस्कान को ढंक नहीं पाई थी

मगर हमारे बाल ज़रूर

पटसन जैसे दिखते थे

ठंड थी पहाड़ों की

हमारी हड्डियों में उतरती हुई

दिया-बाती का समय था

जैसे पहाड़ों पर कहीं-कहीं

टंके हों ज्योति-पुष्प

 

एक कच्ची सड़क थी

लगातार हमारे साथ

दिलासा देती हुई

कि तुम ठीक-ठीक पहुंच जाओगे घर ।

 

*****

 

( समकालीन सृजन के अंक  ‘यात्राओं का ज़िक्र’  से साभार )

3 Comments »

  1. एक कच्ची सड़क थी

    लगातार हमारे साथ

    दिलासा देती हुई

    कि तुम ठीक-ठीक पहुंच जाओगे घर । बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई स्वीकारें।

    Comment by shobha — August 12, 2008 @ 11:04 am

  2. बहुत सुन्दर कविता है। हमेशा की तरह एक और अच्छी रचना पढ़वाने के लिये आभार।

    Comment by रजनी भार्गव — August 12, 2008 @ 11:32 am

  3. सुंदर अभिव्यक्ति।

    Comment by दिनेशराय द्विवेदी — August 12, 2008 @ 5:14 pm

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

Leave a comment

Blog at WordPress.com.