Posted by: PRIYANKAR | August 19, 2008

कलम, आज उनकी जय बोल

स्थायी और मौसमी(जनवरी और अगस्त माह वाले) दोनों तरह के देशभक्तों के  हितार्थ  दिनकर जी की एक कविता

 

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

 

 कलम, आज उनकी जय बोल

 

 जला अस्थियां बारी बारी

छिटकाईं जिनने चिनगारी

जो चढ़ गए पुण्य-वेदी पर

लिए बिना गरदन का मोल

कलम आज उनकी जय बोल

 

जो अगणित लघु दीप हमारे

 
तूफानों में एक किनारे

 
जल-जलकर बुझ गए किसी दिन

 
मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल

 
कलम, आज उनकी जय बोल

 
पीकर जिनकी लाल शिखाएं

 
उगल रही हैं लपट दिशाएं

 
जिनके सिंहनाद से सहमी

 
धरती रही अभी तक डोल

 
कलम, आज उनकी जय बोल

 

 

अंधा चकाचौंध का मारा

क्या जाने इतिहास बेचारा

साखी हैं उनकी महिमा के

सूर्य चंद्र भूगोल खगोल

कलम आज उनकी जय बोल ।

 

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Responses

  1. प्रस्तुति के लिए आभार.

  2. एक लम्बे अन्तराल बात इसे पढ़कर बहुत अच्छा लगा.

  3. आह गुरुदेव !! क्या खुशी दी है कह नहीं सकता. लेकिन एक बेचैनी भी बख्श दी है …. “शहीद स्तवन” को बचपन में लाखों – करोड़ों बार दुहराया है …. अगर इजाज़त हो तो आगे का अंश पोस्ट कर दूँ ? जी में तो आता है कि पढ़ दूँ पूरी कविता जैसे बचपन में न जाने कितनी बार पढी थी ….

    बहरहाल, आज बहुत दिनों बाद फिर से उसी तरह दोहरा रहा हूँ मन ही मन …. अजीब सा है सब कुछ … बचपन की, स्कूल की, स्टेज की यादें …. आप का बहुत बहुत आभार …..

  4. बचपन में बाल भारती में पढ़ी थी । पुराने दिन खूब खूब आए । वैसे ही पाठ किया जैसे बचपन में करते थे ।

  5. बड़ी लाज लग रही है – यह कविता मैने पहले पढ़ी नहीं। और लगता है कि हिन्दी में बहुत कुछ नहीं पढ़ा मैने।
    खैर देर से ही, आपके माध्यम से पढ़ ली यह अच्छी कविता दिनकर जी की। बहुत धन्यवाद।


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