Posted by: PRIYANKAR | मार्च 19, 2009

बस यही एक अच्छी बात है / राजेन्द्र राजन

राजेन्द्र राजन की एक कविता

बस यही एक अच्छी बात है

मेरे मन में
नफरत और गुस्से की आग
कुंठाओं के किस्से
और ईर्ष्या का नंगा नाच है

मेरे मन में
अंधी महत्त्वाकांक्षाएं
और दुष्ट कल्पनाएं हैं

मेरे मन में
बहुत-से पाप
और भयानक वासना है

ईश्वर की कृपा से
बस यही एक अच्छी बात है
कि यह सब मेरी सामर्थ्य से परे है ।

 

*****

 

 

 

 


Responses

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है।
    वह भ्रष्ट क्यों न हुआ? अवसर न था। कुछ कुछ वैसा ही है।
    प्रियंकर जी, आप आए बज्म में यह हमारी खुशकिस्मती है।
    न जाने क्यों आप बार बार शीत समाधि में चले जाते हैं?

  2. ईश्वर की कृपा से
    बस यही एक अच्छी बात है
    कि यह सब मेरी सामर्थ्य से परे है ।

    वाह! क्या बात है।
    लेकिन एक और अच्छी बात है कि नफरत, गुस्से की आग, कुंठाओं के किस्से, ईर्ष्या, अंधी महत्त्वाकांक्षाएं, दुष्ट कल्पनाएं, बहुत-से पाप और भयानक वासना इन सबको अभिव्यक्ति देने का एक मंच है मेरा ब्लॉग- The surreptitious …छिपक्कली। यहाँ बिना अपना परिचय बताये यह सब उगल कर अपना भीतरी हिस्सा साफ कर सकते हैं। थोड़ा सामर्थ्य लाना पड़ेगा। जालस्थल का पता है- http://guptatmaji.blogspot.com

  3. बहुत उम्दा-

  4. बस यही एक अच्छी बात है
    कि यह सब मेरी सामर्थ्य से परे है ।

    ——
    यह सामर्थ्य की न्यूनता अपने में जगाने और जीवित रखने में मैं तो हांफ जाता हूं कभी कभी! वह तो ईश्वर की कृपा है कि यह सामर्थ्य मुझसे छीनते रहते हैं सतत:।

  5. राजन जी पहली बार पढ़ा मज़ा आ गया। वाह वाह

  6. पिछ्ले कुछ दिनों में राजन जी की कई कविताएं पढ़ने में आई हैं……
    एक से एक लाज़वाब….
    यह बेचैनी, यह तड़प अब कम ही देखने में आती है…….

    राजेन्द्र राजन की कविताएं अन्दर बहुत कुछ जोडती घटाती है….
    इस सर्द स्याह माहौल में उम्मीद की किरण की आस को बचाए रखती हैं…

    उन्हे साधुवाद…..

  7. बहुत सुन्दर व सटीक मनोभाव हैं। यह कनजोरी सबमें बनी रहे। पढ़वाने के लिए धन्यवाद।
    घुघूती बासूती

  8. बहुत सुन्दर व सटीक मनोभाव हैं। यह कमजोरी* सबमें बनी रहे। पढ़वाने के लिए धन्यवाद।
    घुघूती बासूती

  9. ईश्वर की इस कृपा को पहचान पाना बड़प्पन की बात है. बहुत अच्छी रचना.

  10. अनहदनाद सतत चले । सप्रेम

  11. achhi kavita!

  12. अच्छी कविता.
    पर इस सिलसिले को रोककर सो जाना छोड़िएगा

  13. राजेंद्र जी, पता नही की आप कविता में सच्चाई कह रहे हैं या फ़िर मन की कल्पना लेकिन बहुत गहरी कह दी है….बस इतना ध्यान रखियेगा की जिस दिन सामर्थ्य बढ़ने लगे, जो कुछ लिखा है उस पर जरा गंभीरता से गौर कर लीजियेगा क्यों महंगा पड़ सकता है…:-)

  14. बहुत अच्छी लगी कविता …धन्यवाद

    रीतेश गुप्ता


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