Posted by: PRIYANKAR | April 9, 2009

विदा

अशोक वाजपेयी की एक कविता

विदा

 

तुम चले जाओगे

पर थोड़ा-सा यहाँ भी रह जाओगे

जैसे रह जाती है

पहली बारिश के बाद

हवा में धरती की सोंधी-सी गंध

भोर के उजास में

थोड़ा-सा चंद्रमा

खंडहर हो रहे मंदिर में

अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार

 

तुम चले जाओगे

पर थोड़ी-सी हँसी

आँखों की थोड़ी-सी चमक

हाथ की बनी थोड़ी-सी कॉफी

यहीं रह जाएँगे

प्रेम के इस सुनसान में

 
तुम चले जाओगे

पर मेरे पास

रह जाएगी

प्रार्थना की तरह पवित्र

और अदम्य

तुम्हारी उपस्थिति

छंद की तरह गूँजता

तुम्हारे पास होने का अहसास

 
तुम चले जाओगे

और थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे .

 

****


Responses

  1. तुम चले जाओगे

    पर मेरे पास

    रह जाएगी

    प्रार्थना की तरह पवित्र

    और अदम्य

    तुम्हारी उपस्थिति

    छंद की तरह गूँजता

    तुम्हारे पास होने का अहसास

    तुम चले जाओगे

    और थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे

    tumhare jaane ke baad bhi tumhara ahsaas hoga. wah.

  2. तुम चले जाओगे
    और थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे .

    बहुत कुछ कह जाती है यह कविता…………

  3. अहोक वाजपेयी जी को सुना है। अच्छे लगे थे – चेहरे-मोहरे और बातों से।
    यह कविता भी अच्छी लगी।

  4. meri priya kavita. isko padhkar Ashok Vajpeyiji ke sangrah THODI SI JAGAH ki yad aa gai.
    aabhar
    pallav

  5. its good

  6. हर व्यक्ति कुछ न कुछ छोड़ ही जाता है, गंध, स्पर्श, ध्वनि या कुछ ज्ञान।

  7. behad khubsurat

  8. बहुत बढिया लिखा है … बधाई।

  9. अशोक वाजपेयी जी की कविता है तो बेशक अच्छी ही होगी। :)
    पढ़वाने का शुक्रिया।

  10. [...] (अनहद नाद से) [...]


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