Posted by: PRIYANKAR | June 5, 2009

गर्जन-तर्जन

 

Manik Bachhawat

Manik Bachhawat

मानिक बच्छावत की एक कविता

 

 

 

गर्जन-तर्जन

 

बहुत जोर से

बोले थे तुम

गरजे थे तुम

बरसे थे तुम

 

फिर तुम रुके

तुमने देखा

जहां तुम खड़े थे

वहीं तुम खड़े थे

 

कहीं कुछ नहीं हुआ

तुम्हारी बातों ने

किसी को नहीं छुआ ।

 

*****

(काव्य संकलन ’पीड़ित चेहरों का मर्म’ से साभार)


Responses

  1. कमाल की कविता। मौजूँ भी है।

  2. कहीं कुछ नहीं हुआ

    तुम्हारी बातों ने

    किसी को नहीं छुआ ।

    अब संवेदनाएं जाती रहीं। आदमी घिर गया है…।

  3. bilkul sahi hai aisa hota hai


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