Posted by: PRIYANKAR | June 25, 2009

देवितमे मा जलधाराओ, गगन गुहा से रस बरसाओ ……

ज्ञानदत्त  जी के आदेश पर कोलकाता के हमारे अत्यंत प्रिय वरिष्ठ कवि-गीतकार दादा छविनाथ मिश्र  का एक और ऋचागीत प्रस्तुत है,  जल की अभ्यर्थना का गीत :

 

( शं नो देवीर अभिष्टय

आपो भवन्तु पीतये ।

शं योर अभिस्रवन्तु नः )

– ऋग्वेद संहिता : १०/९/४

 

पृथ्वी का सुस्वादु सुअमृत
 

 

 

जल ज्योतिर्मय वह आंचल है

जहां खिला

यह सृष्टि-कमल है

जल ही जीवन का सम्बल है

 

आपोमयं जगत यह सारा

यही प्राणमय अन्तर्धारा

पृथिवी का सुस्वादु सुअमृत

औषधियों में नित्य निर्झरित

अग्नि-सोममय रस उज्ज्वल है

 

हरीतिमा से नित्य ऊर्मिला

हो वसुंधरा सुजला सुफला

देवि, दृष्टि दो सुषम सुमंगल

दूर करो तुम अ-सुख-अमंगल

परस तुम्हारा गंगाजल है

 

जल के बिना सभी कुछ सूना

मोती-मानुष चंदन-चूना

देवितमे मा जलधाराओ

गगन गुहा से रस बरसाओ

वह रस शिवतम

ऊर्जस्वल है

ऋतच्छन्द का बिम्ब विमल है

जल ही जीवन का सम्बल है ।

 

*****

 

(वैदिक ऋचाओं के गीतान्तरण ’श्रुति सुगन्ध’ से साभार)


Responses

  1. आभार आपका और ज्ञानदत्त जी का भी.

  2. सुंदर है जल गान
    प्रतीक्षारत हैं कब लाएंगे
    यह अमृत मेघ?

  3. बहुत सुन्दर। वरुण देव की अभी प्रतीक्षा ही चल रही है।
    यह प्रस्तुति के लिये बहुत धन्यवाद प्रियंकर जी।


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