
अज्ञेय की एक कविता
मैंने आहुति बन कर देखा
मैं कब कहता हूं जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,
मैं कब कहता हूं जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने ?
कांटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है
मैं कब कहता हूं वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने ?
मैं कब कहता हूं मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले ?
मैं कब कहता हूं प्यार करूं तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले ?
मैं कब कहता हूं विजय करूं मेरा ऊंचा प्रासाद बने ?
या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने ?
पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे ?
नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे ?
मैं प्रस्तुत हूं चाहे मिट्टी जनपद की धूल बने —
फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गतिरोधक शूल बने !
अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है —
क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसू की माला है ?
वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है
वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन कारी हाला है ।
मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया —
मैंने आहुति बन कर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है !
मैं कहता हूं, मैं बढ़ता हूं, मैं नभ की चोटी चढ़ता हूं
कुचला जाकर भी धूली-सा आंधी-सा और उमड़ता हूं ।
मेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि-धार बने
इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने !
भव सारा तुझको है स्वाहा सब कुछ तप कर अंगार बने —
तेरी पुकार-सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने ।
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मैं कब कहता हूं प्यार करूं तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले ?
मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया —
मैंने आहुति बन कर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है !
aabhaar !
By: parul on जुलाई 22, 2009
at 5:47 अपराह्न
अज्ञेय का क्रांतिकारी स्वर!
By: दिनेशराय द्विवेदी on जुलाई 22, 2009
at 7:34 अपराह्न
अद्वितीय, अदभुत, सशक्त…
By: Nidhi KM on जुलाई 23, 2009
at 12:43 पूर्वाह्न
अज्ञेयजी की कविता पढ़वाने का शुक्रिया।
By: अनूप शुक्ल on जुलाई 23, 2009
at 1:12 पूर्वाह्न
Ati sunder, dil ko choo lene waali!
By: jahnvi on जुलाई 24, 2009
at 3:14 पूर्वाह्न
गजब!
By: Gyan Dutt Pandey on जुलाई 26, 2009
at 7:39 पूर्वाह्न
अज्ञेयजी की यह कविता मुझे बहुत पसन्द है…जीवन मे मैने पहली बार जो उपन्यास पढा वह “शेखर एक जीवनी” था..उसके बाद मुझे कुछ लिखने की प्रेरना मिली..उन्हे नमन..और आपका आभार..
By: Vijendra S Vij on अगस्त 4, 2009
at 5:42 पूर्वाह्न
Inhe pehli bar padh ke maine apne jeewan ki margdarshak panktiyan bana liya tha aur woh mera sabse hitkar nirnay tha
By: Prafulla Shukla on अप्रैल 20, 2010
at 5:39 पूर्वाह्न
Had read the poetry in Xth standard.
At that time its was just a text in syllabus but now its the motivation to move forward and make myself as I am.
By: Prateek ' Ronnie ' Sharma on मार्च 29, 2012
at 2:57 अपराह्न