केदारनाथ अग्रवाल की एक कविता
जमुन जल तुम
रेत मैं हूं — जमुन जल तुम !
मुझे तुमने
हृदय तल से ढंक लिया है
और अपना कर लिया है
अब मुझे क्या रात — क्या दिन
क्या प्रलय — क्या पुनर्जीवन !
रेत मैं हूं — जमुन जल तुम !
मुझे तुमने
सरस रस से कर दिया है
छाप दुख-दव हर लिया है
अब मुझे क्या शोक — क्या दुख
मिल रहा है सुख — महासुख !
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आलोक श्रीवास्तव की एक कविता
एक दिन आयेगा
एक दिन आयेगा
जब तुम जिस भी रास्ते से गुज़रोगी
वहीं सबसे पहले खिलेंगे फूल
तुम जिन झरनों को छुओगी
सबसे मीठा होगा उनका पानी
जिन दरवाजों पर
तुम्हारे हाथों की थपथपाहट होगी
खुशियां वहीं आयेंगी सबसे पहले
जिस भी शख्स से तुम करोगी बातें
वह नफ़रत नहीं कर पाएगा
फिर किसी से
जिस किसी का कंधा तुम छुओगी
हर किसी का दुख उठा लेने की
कूवत आ जायेगी उस कंधे में
जिन भी आंखों में तुम झांकोगी
उन आंखों का देखा हर कुछ
वसंत का मौसम होगा
जिस भी व्यक्ति को तुम प्यार करोगी
चाहोगी जिस किसी को दिल की गहराइयों से
सारे देवदूत शर्मसार होंगे उसके आगे
चैत्र के ठीक पहले
पत्रहीन हो गये पलाश-वृक्षों पर
जैसे रंग उतरता है
ऋतु भीगती है भोर की ओस में
वैसे ही गुजरोगी तुम एक दिन
हमारी इच्छाओं दुखों और स्वप्नों के बीच से
एक दिन आयेगा
जब हम दुखी नहीं होंगे तुम्हें ले कर
तुम्हें दोष नहीं देंगे
उम्मीदें नहीं पालेंगे
पर, सचमुच तुम्हें चाह सकेंगे
तुम भी महसूस कर सकोगी
हमारे प्यार का ताप ।
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पूरा ब्लॉग जगत प्रेममय हो गया है…
By: Lovely kumari on फ़रवरी 14, 2010
at 6:25 पूर्वाह्न
प्रेम के फ़लक को सही विस्तार दिखाने की आपकी जुंबिश…
बेहतरीन कविताएं…
By: रवि कुमार, रावतभाटा on फ़रवरी 14, 2010
at 6:31 पूर्वाह्न
दोनो कविताएँ मन को छू लेने वाली लगीं.
By: meenu khare on फ़रवरी 14, 2010
at 7:15 पूर्वाह्न
Prem ki anubhutiyon se bhari Kavitayen bahut achhi lagi..
Bahut shubhkamnayen…
By: Kavita Rawat on फ़रवरी 14, 2010
at 7:38 पूर्वाह्न
बहुत सुन्दर दिल को छू लेने वाली प्रेम कवितायें हैं। अग्रवाल जी और श्रीवास्तव जी को बधाई आपका धन्यवाद्
By: nirmla.kapila on फ़रवरी 14, 2010
at 1:25 अपराह्न
बहुत सुन्दर कविताएं हैं…
पढ़वाने का आभार।
By: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी on फ़रवरी 14, 2010
at 3:29 अपराह्न
@ निर्मला.कपिला :
केदारनाथ अग्रवाल (1911–2000)
http://en.wikipedia.org/wiki/Kedarnath_Agarwal
By: प्रियंकर on फ़रवरी 14, 2010
at 4:09 अपराह्न
केदारनाथ और आलोक जी की इन सुन्दर रचनाओं का आभार ।
By: हिमांशु on फ़रवरी 15, 2010
at 12:59 पूर्वाह्न
आलोक जी की कविता तो प्रेम को एक टटका रूप दे रही है। पहले प्रेमास्पद के लिए और फिर स्वयं के लिए इतनी आशाएँ और विश्वास सँजोए ! इनके बारे में कुछ और बताइए न।
By: गिरिजेश राव on फ़रवरी 15, 2010
at 2:22 पूर्वाह्न
दोनों रचनाएँ प्यारी हैं …..
By: padmsingh on फ़रवरी 16, 2010
at 3:08 पूर्वाह्न