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अंबर रंजना पाण्डेय
कि दोष लगते देर नहीं लगती ……
किसी स्त्री की परपुरुष से इतनी
मैत्री ठीक नहीं देवि
कि दोष लगते देर नहीं लगती
न गाँठ पड़ते
मेरा क्या मैं तो किसी मुनि का
छोड़ा हुआ गौमुखी कमंडल हूँ
जो लगा कभी किसी चोर के हाथ
कभी वेश्या तो कभी किसी ढोंगी ब्रह्मण के
तुम्हारा तो अपना संसार है देवि
अन्न का भंडार है शय्या है
जल से भरा अडोल कलश धरा है
तुम्हारे चौके में
संतान है स्वामी हैं
भय नहीं तुम्हें कि रह जाऊँगा
जैसे रह
जाता है कूकर रोटी वाले गृह में
चोर हूँ तुम्हारी खिड़की से लटका
पकड़ा ही जाऊँगा
मेरा अंत निश्चित है देवि
मेरा काल देखो आ रहा है
मसान है मेरा ठिकाना
शव मेरी सेज
देखो मुझसे उठती है दुर्गन्ध
युगों जलती चिताओं की
मत लगो मेरे कंठ
मेरे कंधे पर नाग का जनेऊ
मेरे कंठ में विष है देवि ।
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अंबर रंजना पाण्डेय की अन्य कविताएं यहां पढ़ें :
जिसका जो हो, सो हो;
मैं इसी में प्रसन्न हूं
कि;
तो किसी मुनि का
छोड़ा हुआ गौमुखी कमंडल हूँ
मेरे पास एक गौरवशाली इतिहास तो है!
By: Gyandutt Pandey on जुलाई 9, 2011
at 11:39 पूर्वाह्न
ज्ञान जी,
इस कवि में अनुगूंज है एक पुराने कवि समय की . ऐसी कविता भारत में ही लिखी जा सकती थी . यह ऐसे भारत की कविता है जिसमें संस्कृत काव्य और दर्शन की सुदीर्घ परम्परा हो और जिसमें कालिदास,भर्तृहरि,अमरू,भवभूति और बिल्हण लिख चुके हों.
मुझे यह कवि किसी भी समकालीन कवि जैसा नहीं लगता . फिर भी यदि किसी कवि से जोड़ कर तुलना करनी ही हो तो कुछ हद तक त्रिलोचन से ही हो सकती है . इस युवा कवि का जो ढब है मुझे लगता है कि यह कोशिश करे तो सॉनेट बहुत अच्छे लिख सकेगा. इसे वाक्य को अपने ढंग से तोड़ना आता है. हिंदी के अधिकांश युवा कवियों में ’डिक्शन’ की समझ कम है और वे लद्दड़ गद्य लिख रहे हैं. इस युवा कवि में एक परिपक्व कसाव है . लद्दड़ गद्य और बासी किस्म की प्रगीतात्मकता की ढलानों से बचते हुए यह कवि अपने भाषिक संतुलन और सौष्ठव से कविता को बचाये रखता है.
यह कवि कई दशकों के कविता-कूड़े को लांघ कर भारतीय कविता की पुरानी किन्तु चिर नवीन काव्य-परम्परा से आवयविक ढंग से जुड़ता है. जबकि अधिकांश युवा कवि उस कूड़े में ही — समकालीन हिंदी कविता के जंक यार्ड में ही — काम की चीज़ें ढूंढते रह जाते हैं. यह कवि न तो हिंदी कविता के किसी चालू स्कूल से कविता सीख रहा है और न ही किसी बड़े कवि का क्लोन है जो महज सांद्र अम्ल का तनु अम्ल बना रहा हो . लोक और शास्त्र दोनों को साधे यह कवि इसीलिये मेरा प्रिय युवा कवि है .
By: PRIYANKAR on जुलाई 9, 2011
at 2:50 अपराह्न
सचमुच ! अनूठी और ताज़गी से भरपूर कविता है यह।
By: फ़रीद ख़ाँ on जुलाई 9, 2011
at 4:51 अपराह्न
कण्ठ में विष सम्हालने वालों का मान है हमारे यहाँ। आपका प्रस्ताव न स्वीकार हो सकेगा।
By: प्रवीण पाण्डेय on जुलाई 11, 2011
at 2:58 पूर्वाह्न
[...] अंबर रंजना पाण्डेय की एक कविता अपने ब्लाग पर पोस्ट करते हुये [...]
By: मुझसे सती होने की आस मत रखना, कवि : चिट्ठा चर्चा on जुलाई 11, 2011
at 3:17 पूर्वाह्न
अद्भुत लगी यह कविता….. वाकई इनकी कविता में चिरनवीनता है….
By: swapnil tiwari on जुलाई 11, 2011
at 5:28 पूर्वाह्न
पढ़कर दुबारा पढ़ने को और फिर सोचने को बाध्य करती कविता है….उसके ‘डिक्शन’ में कुछ बात है जिस पर ठहरकर कुछ कहना होगा… परिपक्वता सहज दिखाई दे रही है..
By: karan singh chauhan on जुलाई 11, 2011
at 12:47 अपराह्न
बढ़िया…विस्मित करती है एक युवा कवि की यह कविता…..एक लम्बा इतिहास स्त्री – पुरुष सम्बन्ध का….इसमें से झाँकता है. अम्बर ग्रॆट गोईंग. – मनीषा कुलश्रेष्ठ
By: Manisha Kulshreshtha on जुलाई 12, 2011
at 3:24 पूर्वाह्न
Bahut Khoob Ambarji
By: akhil esh on जुलाई 12, 2011
at 3:43 पूर्वाह्न
adbhut kavita. sngrhan yogy .
By: leena malhotra on जुलाई 12, 2011
at 2:08 अपराह्न