हमारे समय की प्रार्थनाएं
नदियो !
तुम यों ही बहती रहो
धरती को सींचती हरा-भरा
करती
मनुष्यों और शेष
जीव जगत के जीवन को
सुनिश्चित करती।
पर्वतो !
तुम यों ही अड़े रहो
विविधतामय वनस्पति को
धारण करते हुए
बादलों से मित्रता को पुख़्ता रखते हुए।
बादलो !
तुम गरजो चाहे जितना भी
बरसते रहो
इतना-भर ज़रूर कि
ताल-तलैया लबालब रहें
कुएं ज़्यादा लंबी रस्सी
की मांग न करें।
सूर्य !
तुम प्रकाश और ऊष्मा का
संचार करते रहो
धरती को हरा-भरा रखो
फूलों को खिलाओ
उन्हें रंग दो- गंध दो
और फलों को रस से
मालामाल करते रहो।
धरती मां !
हमें धारण करती रहो
पर हां हमें
तुम्हारे लायक़ यानि
बेहतर मनुष्य
बनते चले जाने को
प्रेरित करती रहो
कभी-कभी दंडित भी करो
लेकिन प्यार बांटती रहो
अबाध और अनवरत
हमारी अंजुरि ख़ाली न रहे।
और समुद्र !
तुम
निरंतर उथले
होते जा रहे
हम मनुष्यों को
थोड़ी अपनी गहराई
देते चलो।
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ठहराव जब भी..जहां भी…होता है…सुक़ून देता है….प्रार्थना….स्वयं ठहराव है…..विनम्र आग्रहों को समेटे….सरस काव्य हेतु आभार..!
By: राजेश चड्ढ़ा on नवम्बर 1, 2011
at 11:07 पूर्वाह्न
प्राकृतिक कर्तव्यों को याद दिलाती कविता।
By: प्रवीण पाण्डेय on नवम्बर 1, 2011
at 12:23 अपराह्न
और समुद्र !
तुम
निरंतर उथले
होते जा रहे
हम मनुष्यों को
थोड़ी अपनी गहराई
देते चलो।
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बहुत खूब
By: अनूप भार्गव on नवम्बर 1, 2011
at 2:28 अपराह्न
बहुत सुन्दर कामना है। भगवान करे यह पूरी हो।
हम अपने पर्यावरण को प्यार करें तो जरूर…
अच्छी कविता पढ़वाने का आभार।
By: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी on नवम्बर 1, 2011
at 4:38 अपराह्न
हे प्रियंकर!
ऐसे ही प्रस्तुत करते रहो
वह जो पढ़ें तो लगे
कि कुछ पढ़ा
छिछला नहीं, गहरा
By: Gyandutt Pandey on नवम्बर 5, 2011
at 11:22 पूर्वाह्न
इस कविता को पढकर लग रहा है जैसे वैदिककाल के ऋषियों की ऋचाओं का पाठ कर लिया .ऋषि प्रवर मोहन श्रोत्रिय जी का आभार .
By: parmanand shastri on अगस्त 12, 2012
at 4:14 अपराह्न
prakarti ki itni achhi prarthana khabi nahi padi. Badhai Mohan Ji
By: Dilip Okhade on फ़रवरी 2, 2013
at 11:34 पूर्वाह्न