1.
हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये
ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये
छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये .
2.
मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की
आप कहते हैं जिसे इस देश का स्वर्णिम अतीत
वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की
यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी
ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की ?
इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया
सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की
याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार
होता है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की .
***

बड़ी ही गहरी बातें, सीधे शब्दों में।
By: प्रवीण पाण्डेय on दिसम्बर 20, 2011
at 3:15 अपराह्न
विनम्र श्रद्धांजलि गोंडवी साहब को।
By: प्रवीण पाण्डेय on दिसम्बर 20, 2011
at 3:16 अपराह्न
Adam ji ko vinamr shraddhanjali.
By: kshama on दिसम्बर 21, 2011
at 5:46 पूर्वाह्न
बहुत खुब धीमी आँच पे वाष्प से निकले शब्द
बहुत कुच्छ कहते ह।
अब तक की व्यवस्था ने आगे की पीढी के लीये वीशेष कुच्छ अच्छा नही किया तबही तो हर बार आनेवाली पीढी ईस संर्कीण व्यवस्ता मे अपना जीवन असार्थक ढौकर और ज्यादा जटील व्यवस्था छोङकर चले जाते ह
By: pyarelal on दिसम्बर 21, 2011
at 6:50 पूर्वाह्न
अदम गोंड़वी को तो उनके जाने के बाद पढ़ा। जैसे दुष्यंत को उनके जाने के बाद जाना था।
गजब लिखा है दोनो ने।
By: Gyandutt Pandey on दिसम्बर 25, 2011
at 7:50 पूर्वाह्न
mujhe garv hai ki mai bhi us gonda ka vaasi hu jaha aise mahan pratibha wa kawyakusalta ke dhani is surya ka janm hua tha…..
By: Prabhat Ranjan Tiwari on फ़रवरी 2, 2012
at 2:17 अपराह्न