अनहद नाद

May 8, 2008

रजधानी की धज

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:39 am

देवव्रत जोशी का एक गीत/नवगीत

 

रजधानी की धज

 

भूपालों के नगर गए हम

हमने सुने   राग दरबारी ।

 

जाजम पर  हमको  बैठाया

सारा कर्ज़   माफ़ फ़रमाया

फिर वे लगे नाचने खुद ही –

अपनी छवि होते बलिहारी ।

 

देखे   सत्ता के   गलियारे

कागज के मुख  होते कारे

जन  तिनके-सा उड़ता दीखा

रजधानी की  धज ही न्यारी ।

 

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( वागर्थ के जनवरी २००२ अंक से साभार )

 

May 7, 2008

एक कविता पोस्टर

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:42 am

kavitaa poster

 

( समकालीन सृजन के भवानी भाई पर केन्द्रित अंक ‘भवानी प्रसाद मिश्र के आयाम’ के सम्पादक श्री लक्ष्मण केडिया के सौजन्य से प्राप्त )

May 6, 2008

कुंभनदास गए रजधानी

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:35 am

देवव्रत जोशी का एक गीत/नवगीत

 

कुंभनदास

 

कुंभनदास गए रजधानी ।

 

खूब लिखा औ नाम कमाया

दाम नहीं   जीवन में   पाया

राजाजी   ने   अब  बुलवाया

भारी मन, जाने की ठानी ।

 

कुंभन   पहुंचे   पैयां-पैयां

देखा   चोखा     रूप-रुपैया

लेकिन कहां आ गए भैया

यहां नहीं मिलता  गुड़-धानी ।

 

‘धत्तेरे की’  कह कर   लौटे

लोग यहां के सिक्के खोटे

बिन पैंदे के  हैं सब लोटे

जमना है पर खारा पानी ।

 

*****

 

( वागर्थ के जनवरी २००२ अंक से साभार )

 

May 5, 2008

कभी कभी मैं तुमसे भी झूठ बोलता हूं

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 9:26 am

रतन बिश्वास की बांग्ला कविता

 

सफ़ेद झूठ

 

कभी कभी मैं तुमसे भी झूठ बोलता हूं

 

जिसने पहली बार झूठ बोला होगा

शायद वह भी एक कवि था

प्रश्न यह नहीं है कि पहला झूठ किसी

पुरुष ने बोला  या नारी ने

बल्कि यह सवाल अवश्य उठ सकता है

कि पहला झूठ क्षुधा के लिए था, प्रेम के लिए या डींग हांकने के लिए

एक बाघ से मुठभेड़ का बखान था या किसी नये फल वाले जंगल की खोज

या सिर्फ़ आग या चक्के जैसा मनुष्य का एक और आदिम आविष्कार

यह सफ़ेद झूठ

 

पर लोग बदलते गए कौए के घोंसले से नन्हीं कोयल की मां को पहली पुकार देखकर

प्रकृति में पेड़-पौधों और प्राणियों के कैमोफ़्लेज़ से पुलकित

तरह तरह के छद्मावरण ……

 

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हवा ४९ पत्रिका के ‘अधुनांतिक बांग्ला कविता’ अंक से साभार,बांग्ला से अनुवाद : प्रियंकर )

 

May 2, 2008

स्वागत में

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 8:56 am

ठ??ानीप्रसाद मिश्र

       (  1913-1985 )

वानीप्रसाद मिश्र की एक कविता

 

स्वागत में

 

 मन में

जगह है जितनी

 

उस सब में मैंने

फूल की

पंखुरियां

बिछा दी हैं यों

 

कि जो कुछ

मन में आए

 

मन उसे

फूल की पंखुरियों पर

सुलाए !

 

****

 

May 1, 2008

धूप

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 11:01 am

जितेन्द्र श्रीवास्तव की एक कविता

 

धूप

 

धूप किताबों के ऊपर है

या

भीतर कहीं उसमें

कहना

मुश्किल है इस समय

 

इस समय मुश्किल है

कहना

कि किताबें नहा रही हैं धूप में

या धूप किताबों में 

 

पर यह देखना और महसूसना

नहीं मुश्किल

कि मुस्कुरा रही हैं किताबें

धूप की तरह

और धूप गरमा रही है

किताबों की तरह ।

 

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April 30, 2008

कुछेक कवि बगैर पैसे के डॉक्टरी कर रहे हैं

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:37 am

नवारुण भट्टाचार्य की एक बांग्ला कविता

 (हिंदी अनुवाद : अरविंद चतुर्वेद)

 

क्रांति के बिम्ब

 

कुछेक कवि बगैर पैसे के डॉक्टरी कर रहे हैं

चांद पर छलांग लगाने से पहले प्रेमी गिरफ़्तार

पुलिस की गाड़ियां चौबीस घंटे के भीतर

स्कूल-बसों में तब्दील कर दी जाएंगी

 

आधी रात को जनविरोधी पार्टियों की लाइन

उखाड़ फेंकी जा रही है

 

लेटरबॉक्स में चिड़ियों के घोंसला बना लेने से काम ठप

किसी सिद्धांतकार ने एक्वेरियम में बिल्ली पाली है

रेडियो कोई नहीं बजाता क्योंकि नेताओं के भाषण सुनना

अच्छा नहीं लग रहा है

 

बहस हो रही है पौधों और नन्हीं मछलियों पर

उदास संगीत के प्रभाव को लेकर

 

अब आंसुओं से ही चलेंगी मोटर गाड़ियां

मजदूरों का नाटक करने वाले मजदूरों के हाथों परेशान

कौन कह सकता है समस्या नहीं है हमारी इस नई व्यवस्था में

क्या ऐसा ही लगता है समाचार सुनने के बाद ?

 

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( समीर रायचौधुरी द्वारा सम्पादित पत्रिका  हवा ४९  के ‘अधुनांतिक बांग्ला कविता’ अंक से साभार)

 

April 25, 2008

भोर का तारा

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 11:39 am

मानिक बच्छावत की एक कविता

 

भोर का तारा

 

यह नीला आसमान है

और दूर कहीं उगा है

वह तारा

भोर होने में अभी देर है

तेजस्वी लग रहा है वह तारा

 

पूरब से छिटक रहा है उजाला

और नीला आसमान झिलमिलाने लगा है

सूर्य के स्वागत में

 

सूर्य निकलेगा

थोड़ी देर में पूरा आसमान

भर जाएगा गर्म उजाले से

तारा खो जाएगा

 

लेकिन सांझ के बाद

जब थका-हारा सूर्य सो जाएगा

उसे जगाने आएगा

भोर का यही तेजस्वी तारा ।

 

*******

 

( काव्य संकलन ‘पीड़ित चेहरों का मर्म’ से साभार )

 

April 24, 2008

तुम्हारी चुप्पी में

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 4:48 am

जितेन्द्र श्रीवास्तव की एक कविता

 

तुम्हारी चुप्पी में

 

चुप रहो

बस चुप रहो

यह रात की धुन है

इसे यूं ही बजने दो

 

आहिस्ता चलो

इस बेला में

समय को मौन का उपहार दो

 

रात के इस राग में

झींगुर विसर्जित कर रहा है

अपना राग

 

यह विलाप नहीं

फिर भी

कुएं की उदासी

आंकी जा सकती है इस आवाज में

 

यह रात की धुन है

इसे यूं ही बजने दो

और ताक सको जितनी दूर

ताको चांदनी में

 

छू सको तो छू लो उसे

त्वचा की तरह

पर चुप रहो

 

तुम्हारी इस चुप्पी में

दूसरे के अस्तित्व का सम्मान है ।

 

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कवि परिचय :  ‘अनभै कथा’ के युवा कवि . इग्नू में प्राध्यापक . भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित .

 

April 22, 2008

गज़ल के रंग में / अजंता देव

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:04 am

( अजंता देव की सद्यप्रकाशित काव्य-पुस्तिका ‘एक नगरवधु की आत्मकथा’ से साभार . अनुसृजन का आभास देती यह काव्य-पुस्तिका सृजन का ऐसा अनुपम उदाहरण है जो तथाकथित (सतही) मौलिकता से कहीं लाख गुना बेहतर  है . देशज काव्य-परंपरा की अद्भुत अनुगूंज अपने में समोए इस संकलन की कविताओं में आपको भर्तृहरि, अमीर खुसरो, गालिब, नज़ीर यहां तक कि राजकमल चौधरी तक  की काव्य-भाषा के रचनात्मक छींटे और अकुंठ संदर्भ मिलेंगे . और वह काव्य-संगीत मिलेगा जो  वैदिक-औपनिषदिक छंदों और हमारी सामासिक संस्कृति — हमारी गंगा-जमनी तहजीब — से लेकर हमारे लोकगीतों तक में व्याप्त है . यह वह काव्य-परम्परा है जिसके तहत भारत का एक सामान्य चरवाहा भी ‘प्यारे मन की गठरी खोल , जिसमें लाल भरे अनमोल’  जैसा लोकगीत गाकर अन्ततः परम्परा-प्रदत्त औपनिषदिक दर्शन का ही गायन करता है .  इसमें वह सहजता है जो विद्वानों के दर्शन को लोक के जीवन-दर्शन में ढाल देती है .  इस काव्य-संकलन  का मितकथन  और इसकी  सूत्रात्मक शैली  –  ‘एपीग्रैमैटिक स्टाइल’  –  अभिव्यक्ति को और  अधिक  प्रभावकारी बना देती है .  लोक और शास्त्र इस काव्य संकलन की दो आंखें हैं .  –  प्रियंकर )

 

गज़ल के रंग में

 

रात अंधेरी    तारे गुम

इस पल सबसे प्यारे तुम ।

 

जितना हमसे दूर हुए

उतने हुए हमारे तुम ।

 

घास  फूल चिड़िया  आकाश

सबमें   नदी किनारे  तुम ।

 

अनजाने में   जीत गए

जानबूझ कर हारे तुम । 

 

मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा

मेरे पंज पियारे तुम ।

 

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