अनहद नाद

April 16, 2008

रोटी का सवाल

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 10:37 am

( कोटा निवासी महेन्द्र नेह अत्यंत सरस गीतकार हैं . एक-दो बार उनके गीत सुनने का मौका मिला है . प्रस्तुत गीत जो मेरे पसंदीदा गीतों में शामिल है, अभिव्यक्ति (सं०-शिवराम) द्वारा प्रकाशित एक पुस्तिका से लिया गया है . ‘अनवरत’ और ‘तीसरा खंबा’ नामक  चिट्ठों पर अपनी बात रखने वाले विधिवेत्ता ब्लॉगर  दिनेशराय द्विवेदी के अभिन्न मित्र हैं महेन्द्र नेह और शिवराम  )

 

महेन्द्र नेह का एक जनगीत

 

रोटी का सवाल

 

रोटी का सवाल भैया रोटी का सवाल

लाखों-लाख करोड़ों भूखे-नंगों का सवाल

तेरा भी सवाल है ये मेरा भी सवाल

 

तेरे घर में सूखी रोटी, मेरे घर में फ़ाका

तेरे घर में सेंध लगी तो मेरे घर में डाका

मैं भी फटेहाल भैया तू भी फटेहाल ॥१॥

 

तुझको मारा खुली सड़क पर, मुझको गलियारे में

तुझको मारा भिनसारे में, मुझको अंधियारे में

जीना है मुहाल मेरा, तेरा भी मुहाल ॥२॥

 

तू चक्की में पिसा, दबा मैं ज़ालिम चट्टानों में

तू लहरों में फंसा हुआ, मैं पागल तूफ़ानों में

मैं थामूं पतवारें, थोड़ी तू भी झोंक संभाल ॥३॥

 

तुझ पर चली खेत में गोली, मुझ पर मिल हाते में

दोनों नाम लिखे मंडी के बनिये के खाते में

तू भी हुआ हलाल प्यारे मैं भी हुआ हलाल ॥४॥

 

तेरी भवें तनी, आंखों में मेरी भी अंगारे

तू भी काट गुलामी, मैं भी तोड़ूं बंधन सारे

मैंने लिया हथौड़ा साथी, तू भी उठा कुदाल ॥५॥

 

********

 

March 13, 2008

दुनिया की सबसे शानदार कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:13 pm

 महेन्द्र सिंह पूनिया की एक कविता

 

दुनिया की सबसे शानदार कविता

 

दुनिया की सबसे शानदार कविता

कलम से नहीं

हल की नोक से लिखी जाती है

दुनिया की सबसे शानदार कविता

मंडी हाउस में बैठनेवाला दलाल नहीं

लालटेन की रौशनी में

कसीदा काढ़नेवाली

सलमा लिखती है

दुनिया की सबसे शानदार कविता

स्याही से नहीं

सड़क पर पत्थर कूटती

रामरती के

पसीने से लिखी जाती है

दुनिया की सबसे शानदार कविता

चरवाहों के पैरों से

थार के सीने पर लिखी जाती है

दुनिया की सबसे शानदार कविता

अजायबघर से सजे बैठकखानों में नहीं

गिरिडीह की

कोयला-खदानों में लिखी जाती है

 

दुनिया की सबसे शानदार कविता का पाठ

वातानुकूलित सभागारों में नहीं

उन्मुक्त चांदनी रात में

खेत की मेंड़ पर होता है।

 

*****

 

February 13, 2008

मेरी कथा

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 10:14 am

 लीलाधर जगूड़ी

 लीलाधर जगूड़ी की एक कविता

 

मेरी कथा

 

मेरी कथा

फावड़ा घिस जाने की

कारखाना उजड़ जाने की

सड़क टूट जाने की कथा है

 

मेरी कथा

पत्थर के रेत हो जाने की

पेड़ के

लकड़ी हो जाने की

कोयले के

आग हो जाने की कथा है

 

मेरी कथा

जाने हो जाने की कथा है ।

 

********

 

(काव्य संकलन ‘बची हुई पृथ्वी’ से साभार)

 

February 12, 2008

ठंडी आलमारी

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 10:49 am

मानिक बच्छावत की एक कविता

 

ठंडी आलमारी

 

उन्होंने खरीद ली है

ठंडी आलमारी

बूढे-बच्चे खुश

खूब खाने को मिलेगी बरफ

जब चाहेंगे निकालकर

पिएंगे ठंडा पेय

और सारा सामान

सुरक्षित अलग से

 

सिर्फ उदास है

घर की मेहरिन

अब उसे बचा-खुचा भी

नहीं मिलेगा खाने को ।

 

*****

 

(काव्य संकलन ‘पीड़ित चेहरों का मर्म’ से साभार)

 

January 3, 2008

शुभकामनाएं/सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 11:07 am

नए साल की शुभकामनाएं !
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नए साल की शुभकामनाएं !
खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को
कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को
नए साल की शुभकामनाएं ! 

जांते के गीतों को बैलों की चाल को
करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को
नए साल की शुभकामनाएं !

इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को
चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को
नए साल की शुभकामनाएं !

वीराने जंगल को तारों को रात को
ठंडी दो बंदूकों में घर की बात को
नए साल की शुभकामनाएं !

इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल को
सिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़याल को
नए साल की शुभकामनाएं !

कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को
हर नन्ही याद को हर छोटी भूल को
नए साल की शुभकामनाएं !

उनको जिनने चुन-चुनकर ग्रीटिंग कार्ड लिखे
उनको जो अपने गमले में चुपचाप दिखे
नए साल की शुभकामनाएं !

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December 5, 2007

एक जूतोन्मुखी कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 10:25 am

सागर जैसे उन्मुक्त मन …….

 

“सागर जैसे उन्मुक्त मन

आकाश जैसी असीमित कल्पना

पवन जैसी प्रचंड साहसी और

पृथ्वी जैसी अविचल आत्मा वाले महानुभावों के लिए

उपलब्ध है वुडलैंड का जूता”

विश्वहाट की जय हो भैया

कस के    पैसा सूंता

 

जीवन शैली बदल रही है

बदल रहा    परिवेश

किसकी भाषा   कैसी संस्कृति

बेच खाएंगे देश ।

 

          –  प्रियंकर

*****

कविता की पहली पांच पंक्तियां जूते के एक विज्ञापन का अनुवाद हैं. क्या आपको भी  यह शब्द और अर्थ का अवमूल्यन लगता है ?

 

November 8, 2007

स्मृति के शिलालेख

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 9:48 am

Priyankar  

प्रियंकर की एक कविता 

 

 स्मृति के शिलालेख

मदन चाचा के लिए

 

रेत के इस महासमुद्र में
कुछ द्वीप हैं–  आस्था के ध्यान के
इस बियाबान रेगिस्तान में
बोधिवृक्ष हैं– सत्य के ज्ञान के
यह सच है कि
उनकी अमरता हेतु अंधकूपों में
कालपात्र नहीं गड़े हैं
पर उनकी कालजयी स्मृतियों के शिलालेख
मन की दराज़ों में जड़े हैं

वे आदर्शों की महागाथा हैं
उनकी हर पंक्ति को
उद्धरण की तरह दोहराया जा सकता है
वे लय के महाकाव्य हैं
उनके जीवन-छन्द को
सामगान की तरह गाया जा सकता है
उन्होंने स्वयं सूर्य के सारथी से
नियमितता का मन्त्र लिया है
उन्हें वाणी और विनायक दोनों ने
अपना आशीर्वाद दिया है

उनका कहना है– आस्था के हाथ में मशाल होनी चाहिए
और सत्य के हाथ में होनी चाहिए तलवार
जहां सक्रिय हैं– असत्य अनाचार और वंचना
ठीक वहीं पर होना चाहिए वार

वे अब नहीं हैं–  परन्तु वह विश्वास
जो उन्होंने मन की क्यारी में बोया है, उगेगा
दीप जो उन्होंने जगाया है, ज्योति-छन्द बुनेगा
और वह बात जो उन्होंने समझायी है –
जमाना बहुत गौर से सुनेगा
बहुत सावधानी से गुनेगा

समय अवसाद का नहीं
आत्मनिरीक्षण का है
व्यक्तित्व के परीक्षण का है
बोये गए बीज़ों के अंकुरण का है
समय किसी अन्य उपलब्धि का नहीं
प्राप्त आदर्शों के पुनर्वितरण का है

यह भ्रम है कि वे अब
गुमनामी के अंधेरों में खो जायेंगे
अभी वे ज्योति पुंज थे     ज्ञानदीप थे
अब वे ध्रुवतारा हो जायेंगे
हर दिशाभ्रमित नाविक को
रास्ता दिखायेंगे
हर डगमगाते कदम को 
फिसलने से बचायेंगे
 
साथियो !
जो थे,   वे भी नहीं रहे
जो हैं,   वे भी नहीं रहेंगे
पर हम सब मिलकर
एक बात जरूर कहेंगे–
कि यही वो कर्मभूमि है
जहां वे उम्र की एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए
आदर्श के अनूठे प्रतिमान गढ़ते रहे
हम सब आगे     और आगे बढ़ते रहे
किन्तु वे अनवरत –  आंधियारों के खिलाफ़
एक छापामार लड़ाई लड़ते रहे ।

 

      ********

 

November 1, 2007

शब्द जो शब्द भर नहीं हैं

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:03 am

Priyankar 

प्रियंकर की एक कविता

 

शब्द जो शब्द भर नहीं है

 

प्यार !
एक बहुउद्धृत शब्द !

यह निरा शब्द ही तो है
जैसे अंक हैं
गणित में ।
 
नहीं !
मैं शब्द के संगीत को
पा नहीं सका था
और अर्थ की सतहों के पार
जा नहीं सका था

शब्द जो बहता है
सदानीरा सा
शब्द जो मचलता है
लय है
शब्द जो अंकुर है
पराजय का
शब्द जो स्वयं ही
जय है

शब्द जो मधुमास को
पुकार लाते हैं
शब्द जो गंध की नदी से
पार आते हैं

शब्द जो  किसी साज से
बज सकें
शब्द जो किसी के होठों पर
सज सकें

शब्द जो दहकता है
पलाश सा
शब्द जो महकता है
गुलाब सा

शब्द चाहिए जिसे –
उपयुक्त माध्यम
उपयुक्त समय
शब्द चाहिए जिसे –
उपयुक्त श्रोता
उपयुक्त जगह

जहां से शब्द
किसी हरसिंगार सा
झर सके
और हर शब्द-याचक
अपनी झोली
भर सके 
 
जब तुम पहचान रही थीं
अवसर की उपयुक्तता
मैं वहीं समय के प्रवाह में
पतवार थामे खड़ा था
और ये शब्द प्यार
तुम्हारें होठों पर
मुस्कराहट की तरह जड़ा था
 
तुमने इसे
किसी भी उद्देश्य से कहा हो
मैंने इस शब्द-सुरा को
पूरी तन्मयता से पिया है
सम्भव है –   तुमने फिर
सोचा भी न हो
मैंने तो
पूरी गम्भीरता से जिया है ।

 

      *******
 

 

October 30, 2007

तुमुलिनी

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 1:11 pm

प्रणव पाल की एक बांग्ला कविता

अनुवाद : समीर रायचौधुरी

 

तुमुलिनी

 

कहीं कुछ हलचल है

आंखों से हरेपन को उतारती    पीचवाली सड़क पर जंगल की सहेली …

सुरीले कंठ से होकर उतर रही है जो भरी हुई नदी

जो अम्पायर लिख रहा है गैलरी की रुलाई,उसकी सीमाओं को तोड़ दो

तुम्हें पता है गेंद का रहस्य ?

बज उठेंगे मैदान के पांव, क्रिकेट की पिच …

 

धूप भरी इस दोपहर में ऊंघती परछाईं से ढंक रहे हो चेहरे को

राजनीति के जनानेपन को छोड़ो, आंचल की कला को बचाओ

महाकाश तुम्हारे दोनों हाथों में फंसा है ।

 

रिक्शे पर चढने से पहले जान लो पैडल का दुख

साइकिल का खाली कैरियर

अपने प्रभु को पुकार रहा है …

कीर्तनियों की लय में गाता है पदावली

पुल को पार करती दूर जा रही हैं रिक्शे की विलासिताएं ।

 

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( बांग्ला लघु पत्रिका हवा ४९ के पोस्ट-मॉडर्न बांग्ला पोएट्री पर  केन्द्रित अंक ‘अधुनान्तिक बांग्ला कविता’ से साभार )  

 

October 29, 2007

कुंवर नारायण की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 9:40 am

  

 दुनिया की चिन्ता 

 

छोटी सी दुनिया

                             बड़े-बड़े इलाके

हर इलाके के

                          बड़े-बड़े लड़ाके

हर लड़ाके की

                          बड़ी-बड़ी बन्दूकें

   हर बन्दूक के बड़े-बड़े धड़ाके

 

सबको दुनिया की चिन्ता

 सबसे दुनिया को चिन्ता ।

 

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( काव्य संकलन इन दिनों  से साभार )

 

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