अंबर रंजना पाण्डेय

कि दोष लगते देर नहीं लगती ……

किसी स्त्री की परपुरुष से इतनी
मैत्री ठीक नहीं देवि

कि दोष लगते देर नहीं लगती
न गाँठ पड़ते

मेरा क्या मैं तो किसी मुनि का
छोड़ा हुआ गौमुखी कमंडल हूँ
जो लगा कभी किसी चोर के हाथ
कभी वेश्या तो कभी किसी ढोंगी ब्रह्मण के

तुम्हारा तो अपना संसार है देवि
अन्न का भंडार है शय्या है
जल से भरा अडोल कलश धरा है
तुम्हारे चौके में
संतान है स्वामी हैं

भय नहीं तुम्हें कि रह जाऊँगा
जैसे रह
जाता है कूकर रोटी वाले गृह में

चोर हूँ तुम्हारी खिड़की से लटका
पकड़ा ही जाऊँगा
मेरा अंत निश्चित है देवि
मेरा काल देखो आ रहा है

मसान है मेरा ठिकाना
शव मेरी सेज
देखो मुझसे उठती है दुर्गन्ध
युगों जलती चिताओं की

मत लगो मेरे कंठ
मेरे कंधे पर नाग का जनेऊ
मेरे कंठ में विष है देवि ।

****

अंबर रंजना पाण्डेय की अन्य कविताएं यहां पढ़ें :

http://vatsanurag.blogspot.com/2011/05/blog-post_14.html

 1.
आम के बाग़

आम के फले हुए पेड़ों
के बाग़ में
कब जाऊँगा ?

मुझे पता है कि
अवध, दीघा और मालदह में
घने बाग़ हैं आम के
लेकिन अब कितने और
कहाँ कहाँ
अक्सर तो उनके उजड़ने की
ख़बरें आती रहती हैं ।

बचपन की रेल यात्रा में
जगह जगह दिखाई देते थे
आम के बाग़
बीसवीं सदी में

भागलपुर से नाथनगर के
बीच रेल उन दिनों जाती थी
आम के बाग़ों के बीच
दिन में गुजरो
तब भी
रेल के डब्बे भर जाते
उनके अँधेरी हरियाली
और ख़ुशबू से

हरा और दूधिया मालदह
दशहरी, सफेदा
बागपत का रटौल
डंटी के पास लाली वाले
कपूर की गंध के बीजू आम

गूदेदार आम अलग
खाने के लिए
और रस से भरे चूसने के लिए
अलग
ठंढे पानी में भिगोकर

आम खाने और चूसने
के स्वाद से भरे हैं
मेरे भी मन प्राण

हरी धरती से अभिन्न होने में
हज़ार हज़ार चीज़ें
हाथ से तोड़कर खाने की सीधे
और आग पर पका कर भी

यह जो धरती है
मिट्टी की
जिसके ज़रा नीचे नमी
शुरू होने लगती है खोदते ही !

यह जो धरती
मेढक और झींगुर
के घर जिसके भीतर
मेढक और झींगुर की
आवाज़ों से रात में गूँजने वाली

यह जो धारण किये हुए है
सुदूर जन्म से ही मुझे
हम ने भी इसे संवारा है !

यह भी उतनी ही असुरक्षित
जितना हम मनुष्य इन दिनों

आम जैसे रसीले फल के लिए
भाषा कम पड़ रही है
मेरे पास

भारतवासी होने का सौभाग्य
तो आम से भी बनता है !

2.

गाय और बछड़ा

एक भूरी गाय
अपने बछड़े के साथ
बछड़ा क़रीब एक दिन का होगा
घास के मैदान में
जो धूप से भरा है

बछड़ा भी भूरा ही है
लेकिन उसका नन्हा
गीला मुख
ज़रा सफेद

उसका पूरा शरीर ही गीला है
गाय उसे जीभ से चाट रही है

गाय थकी हुई है ज़रूर
प्रसव की पीड़ा से बाहर आई है
फिर भी
बछड़े को अपनी काली आँखों से
निहारती जाती है
और उसे चाटती जा रही है

बछड़े की आँखें उसकी माँ
से भी ज़्यादा काली हैं
अभी दुनिया की धूल से अछूती

बछड़ा खड़ा होने में लगा है
लेकिन
कमल के नाल जैसी कोमल
उसकी टाँगें
क्यों भला ले पायेंगी उसका भार !
वह आगे के पैरों से ज़ोर लगाता
है
उसके घुटने भी मुड़ रहे हैं
पहली पहली बार
ज़रा-सा उठने में गिरता
है कई बार घास पर
गाय और चरवाहा
दोनों उसे देखते हैं

सृष्टि के सबक हैं अपार
जिन्हें इस बछड़े को भी सीखना होगा
अभी तो वह आया ही है

मेरी शुभकामना
बछड़ा और उसकी माँ
दोनों की उम्र लम्बी हो

चरवाहा बछड़े को
अपनी गोद में लेकर
जा रहा है झोपड़ी में
गाय भी पीछे-पीछे दौड़ती
जा रही है।

***

Posted by: PRIYANKAR | मार्च 29, 2011

कवि सब अच्छे हैं ….

भवानीप्रसाद मिश्र की एक कविता 

 

लोग सब अच्छे हैं

कवि सब अच्छे हैं

चीज़ें सब अच्छी हैं

तुलनाएं मत करो

समझो अलग-अलग सबको

समझो अलग-अलग देखो –

स्नेह से और सहानुभूति से

एक हैं सब और अच्छे

चीज़ों की तुलना का

क्या अर्थ है

सब चीज़ें अपने-अपने ढंग से

पूरी हैं

और सब लोग

अधूरे हैं

कवि की अलग बात है

वह न चीज़ों में आता है

न लोगों में ठीक-ठीक

समाता है उस समय

जब वह लिखता होता है

जो संयोगों के अर्थों

और अभिप्रायों में पड़ा है

वह किससे छोटा है

किससे बड़ा है

एक ठीक कवि की

किसी दूसरे ठीक कवि से

तुलना मत करो

पढ़ कर उन्हें अपने को

अभी खाली करो

अभी भरो !

****

* भवानी भाई,सिवनी-मालवा में लोक सम्मान(१९७३)



विनय मजूमदार (1934-2006)

(बांग्ला से अनुवाद एवं प्रस्तुति : नीलकमल)



अकाल्पनिक

तुम्हारे भीतर आऊंगा, हे नगरी, कभी-कभी चुपचाप
बसन्त में कभी, कभी बरसात में
जब दबे हुए ईर्ष्या-द्वेष
पराजित होंगे इस क़लम के आगे
तब, जैसा कि तुमने चाहा था, एक सोने का हार भी लाऊंगा उपहार।
तुम्हारा सर्वांग ज्यों इश्तहार
यौवन के बाज़ार का, फिर भी तुम्हारे पास आकर
महसूस होता है, जैसे तुम्हारी अपनी
एक तहज़ीब है, सिर्फ़ तुम्हारी, और जो आदमी के भीतर की
चिरन्तन वृत्ति का प्रकाश भी है।
हे नगरी, महज कुछ-एक बार तुम्हारे भीतर आना
यह एहसास देता है कि जैसे तीनों-लोक में
नहीं कोई भी तुम्हारे जैसा, तुम्हारा नशा, तुम्हारी देह, तुम्हारी बातें, और तुम्हारा स्वाद है ऐसा।

****

राजेन्द्र राजन की एक कविता

तुम अकेले नहीं हो विनायक सेन

 

जब तुम एक बच्चे को दवा पिला रहे थे
तब वे गुलछर्रे उड़ा रहे थे
जब तुम मरीज की नब्ज टटोल रहे थे
वे तिजोरियां खोल रहे थे
जब तुम गरीब आदमी को ढांढस बंधा रहे थे
वे गरीबों को उजाड़ने की
नई योजनाएं बना रहे थे
जब तुम जुल्म के खिलाफ आवाज उठा रहे थे
वे संविधान में सेंध लगा रहे थे

 
वे देशभक्त हैं
क्योंकि वे व्यवस्था के हथियारों से लैस हैं
और तुम देशद्रोही करार दिए गए

जिन्होंने उन्नीस सौ चौरासी किया
और जिन्होंने उसे गुजरात में दोहराया
जिन्होंने भोपाल गैस कांड किया
और जो लाखों टन अनाज
गोदामों में सड़ाते रहे
उनका कुछ नहीं बिगड़ा
और तुम गुनहगार ठहरा दिए गए

लेकिन उदास मत हो
तुम अकेले नहीं हो विनायक सेन
तुम हो हमारे आंग सान सू की
हमारे लिउ श्याओबो
तुम्हारी जय हो ।

****

Posted by: PRIYANKAR | अक्टूबर 5, 2010

केदारनाथ अग्रवाल की एक कविता

केदारनाथ अग्रवाल (1911 — 2000)

अहिंसा

मारा गया
लूमर लठैत
पुलिस की गोली से

किया था उसने कतल
उसे मिली मौत
किया था कतल पुलिस ने
उसे मिला ईनाम

प्रवचन अहिंसा का
हो गया नाकाम !

(२१-६-१९७२)

****
(कवि के संकलन ’कहें केदार खरी-खरी’ से साभार)

Posted by: PRIYANKAR | सितम्बर 19, 2010

नीलकमल की एक कविता

सहज-सुदर्शन युवा कवि नीलकमल का पहला कविता-संग्रह ’हाथ सुंदर लगते हैं’ हाल ही में प्रकाशित हुआ है . उन्हें बहुत-बहुत बधाई !  यानी ’एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ’ . शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है इसी संग्रह से उनकी एक कविता :

पोखरण-2

 

बुद्ध चौबीस वर्षों के बाद

फिर हंसे

पांच ठहाकों ने फेर दीं

दुनिया की नज़रें

सारनाथ की वह सभा

पीढ़ियों बाद अपने उपदेशक से

जानना चाहती है

बोधिवृक्ष की जड़ें कहां हैं ?

****

Posted by: PRIYANKAR | जुलाई 22, 2010

आलोक धन्वा की एक कविता

नदियाँ

इछामती और मेघना
महानन्दा
रावी और झेलम
गंगा गोदावरी
नर्मदा और घाघरा
नाम लेते हुए भी तकलीफ़ होती है

उनसे उतनी ही मुलाक़ात होती है
जितनी वे रास्ते में आ जाती हैं

और उस समय भी दिमाग़
कितना कम पास जा पाता है
दिमाग़ तो भरा रहता है
लुटेरों के बाज़ार के शोर से।

*****

युवा कवि विमलेश त्रिपाठी की दो कविताएं :

अर्थ विस्तार

जब हम प्यार कर रहे होते हैं
तो ऐसा नहीं
कि दुनिया बदल जाती है

बस यही
कि हमें जन्म देने वाली मां के
चेहरे की हंसी बदल जाती है

हमारे जन्म से ही
पिता के मन में दुबका रहा
सपना बदल जाता है

और
घर में सुबह-शाम
गूंजने वाले
मंत्रों के अर्थ बदल जाते हैं।

*****

वैसे ही आऊंगा

मंदिर की घंटियों की आवाज के साथ
रात के चौथे पहर
जैसे पंछियों की नींद को चेतना आती है

किसी समय के बवंडर में
खो गए
किसी बिसरे साथी के
जैसे दो अदृश्य हाथ
उठ आते हैं हार  के क्षणों में

हर रात सपने में
मृत्यु का एक मिथक जब टूटता है
और पत्नी के झुराए होंठो से छनकर
हर सुबह
जीवन में जीवन-रस आता है पुनः जैसे

कई उदास दिनों के
फाके क्षणों के बाद
बासन की खड़खड़ाहट के साथ
जैसे अंतड़ी की घाटियों में
अन्न की सोंधी भाप आती है

जैसे लंबे इंतजार के बाद
सुरक्षित घर पहुँचा देने का
मधुर संगीत लिए
प्लेटफॉर्म पर पैसेंजर आती है

वैसे ही आऊँगा मैं…..

*****

एक कविता : १९ फरवरी २०१०

चुभा कर कृतघ्नता की कटार मेरे वक्ष में
वे सब चले गए हैं अपने-अपने कक्ष में

मैं उनकी अनुकम्पाओं का अहसानमंद हूं
चुपचाप घावों को सहलाता कोठरी में बन्द हूं

उन्हें जो कुछ लेना था मुझसे, ले गए
उन्हें जो कुछ देना था मुझको, दे गए ।

****
Here is its English rendering:

I am almost done to death by their ingratitude
Nursing the wounds without a word, in solitude

I am grateful to what they have done
Though saddened yet complaints none

They have taken from me whatever they could
They have given me only that which they would

****
(English Translation by the poet himself)

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