अनहद नाद

July 8, 2008

किवाड़

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 6:08 am

कुमार अम्बुज की एक कविता

 

किवाड़



ये सिर्फ़ किवाड़ नहीं हैं

जब ये हिलते हैं
माँ हिल जाती है
और चौकस आँखों से
देखती है -’क्या हुआ?’

मोटी साँकल की
चार कड़ियों में
एक पूरी उमर और स्मृतियाँ
बँधी हुई हैं
जब साँकल बजती है
बहुत कुछ बज जाता है घर में

इन किवाड़ों पर
चंदा सूरज
और नाग देवता बने हैं
एक विश्वास और सुरक्षा
खुदी हुई है इन पर
इन्हे देखकर हमें
पिता की याद आती है

भैया जब इन्हें
बदलवाने की कहते हैं
माँ दहल जाती है
और कई रातों तक पिता
उसके सपनों में आते हैं

ये पुराने हैं
लेकिन कमज़ोर नहीं
इनके दोलन में
एक वज़नदारी है
ये जब खुलते हैं
एक पूरी दुनिया
हमारी तरफ़ खुलती है

जब ये नहीं होंगे
घर
घर नहीं रहेगा।

*****

 

*  इसी कविता पर कुमार अम्बुज को भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार प्राप्त हुआ था .

July 7, 2008

प्रशस्ति

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 5:26 am

बद्रीनारायण की एक कविता

 

प्रशस्ति

 

रक्ताभ अश्व पर

तपते सूर्य के तिलक से आभूषित

अग्नि का तरकस

और ऊष्मा का तूणीर बांधे

उपेक्षा के लौह शिरस्त्राण से आच्छादित

समय के गर्भ से

लहरों की तरह

निकल रहा यह योद्धा

स्त्री के लिए नहीं

गेहूं के पौधों के लिए लड़ेगा ।

 

****

 

( नंदकिशोर नवल और संजय शांडिल्य द्वारा संपादित कविताओं के संकलन ‘संधि-वेला’ से साभार )

 

 

July 4, 2008

विस्थापन

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 7:29 am

एकांत श्रीवास्तव की एक कविता

 

विस्थापन

 

मैं बहुत दूर से उड़कर आया पत्ता हूं

 

यहां की हवाओं में भटकता

यहां के समुद्र, पहाड़ और वृक्षों के लिए

अपरिचित, अजान, अजनबी

 

जैसे दूर से आती हैं समुद्री हवाएं

दूर से आते हैं प्रवासी पक्षी

सुदूर अरण्य से आती है गंध

प्राचीन पुष्प की

मैं दूर से उड़कर आया पत्ता हूं

 

तपा हूं मैं भी

प्रचंड अग्नि में देव भास्कर की

प्रचंड प्रभंजन ने चूमा है मेरा भी ललाट

जुड़ना चाहता हूं फिर किसी टहनी से

पाना चाहता हूं रंग वसंत का ललछौंह

 

नई भूमि

नई वनस्पति को

करना चाहता हूं प्रणाम

मैं दूर से उड़कर आया पत्ता हूं ।

 

****

July 3, 2008

कोई याद आता है निषिद्ध !

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 12:25 pm

इन दिनों का रंग

बोधिसत्व की एक कविता

 

निषिद्ध

 

कोई याद आता है

आरती के समय

भोग लगाते समय

जलाभिषेक के समय

नींद के समय

कभी-कभी एकदम रात में

जब घंटियां रो रही होती हैं पूजा की

जब शंख भीतर ही भीतर

सुबक रहे होते हैं

कोई याद आता है, निषिद्ध !

 

****

 

July 1, 2008

अहमद फ़राज़ का एक शे’र

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 7:23 am

(यात्रा-साहित्य पर केन्द्रित समकालीन सृजन के अंक ‘यात्राओं का जिक्र’ के प्रकाशन के बाद उर्दू शे’र-ओ-शायरी पर केन्द्रित संकलन/कोश पर काम शुरू किया है . इसी क्रम में प्रस्तुत है एक शे’र  :

 

शायद कोई …..

 

शायद कोई ख्वाहिश रोती रहती है

मेरे अन्दर बारिश होती रहती है ।

 

*****

 

June 27, 2008

जब एक दिन हांग्जो* शहर की सुंदर लड़की का बटुआ चोरी हो गया

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 9:33 am

ऋतुराज की एक कविता

 

जब एक दिन हांग्जो* शहर की सुंदर लड़की का बटुआ चोरी हो गया

 

कभी इतनी धनवान मत बनना कि लूट ली जाओ

 

सस्ते स्कर्ट की प्रकट भव्यता के कारण

हांग्जो की गुड़िया के पीछे वह आया होगा

चुपचाप बाईं जेब से केवल दो अंगुलियों की कलाकारी से

बटुआ पार कर लिया होगा

 

सुंदरता के बारे में उसका ज्ञान मात्र वित्तीय था

एक लड़की का स्पर्श क्या होता है वह बिलकुल भूल चुका था

 

एक नितांत अपरिचित जेब में अगर उसे जूड़े का पिन

या बुंदे जैसी स्वप्निल-सी वस्तुएं मिलतीं तो वह निराश हो जाता

और तब हांग्जो की लड़कियों के गालों की लालिमा भी

उसे पुनर्जीवित नहीं कर सकती थी

 

उस वक्त वह मात्र एक औजार था बाज़ार व्यवस्था का

खुले द्वार जैसी जेब में जिसे उसकी तेज निगाहों ने झांककर देखा था

कि एक भोली रूपसी की अलमस्त इच्छाएं उस बटुए में भरी थीं

कि बिना किसी हिंसा के उसने साबित कर दिया

सुंदर होने का मतलब लापरवाह होना नहीं है

कि अगर लक्ष्य तय हो तो कोई दूसरा आकर्षण तुम्हें डिगा नहीं सकता ।

 

****

 * दक्षिण चीन के चच्यांग प्रांत का अत्यंत एक प्रसिद्ध शहर जहां की लड़कियों की सुंदरता जगत-प्रसिद्ध है, खासतौर पर उनके मुखमंडल की लालिमा .

 

(समकालीन सृजन के ‘यात्राओं का जिक्र’ अंक से साभार)

 

June 20, 2008

दुनियादार आदमी

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 2:07 pm

कुमार अम्बुज की एक कविता

 

दुनियादार आदमी

 

उसके पास वक़्त होता है
कि वह सबसे नमस्कार करता हुआ पूछ सके –
‘ कहो, कैसे हो ? ‘
पड़ोसी के दुख के बारे में
वह मुस्कराकर जानकारी लेता है
उसके पास सुन्दर उजले शब्द होते हैं

कुछ खाते होते हैं बैंक में उसके
और कुछ बीमा-पॉलिसी

कभी-कभी वह संगीत के बारे में बात करता है
नृत्य में जाहिर करता है अपनी रुचि
रामलीला दुर्गापूजा के लिए देता है चंदा
वह तपाक से हाथ मिलाता है कहता है –
‘आपसे मिलकर ख़ुशी हुई !’

हिसाब लगाकर वह जमीन खरीदता है
फिर थोड़े-से शेयर्स
बनवाता है आभूषण
कुछ पैसा वह घर की अलमारी में बचा रखता है
लॉकर के लिए लगाता है बैंक में दरख़्वास्त
कार खरीदते हुए
पत्नी की तरफ़ देखकर मुस्कराता है
सोचता है ज़िन्दगी ठीक जा रही है
सफल हो रहा है मानव-जीवन
और इस सब कुछ ठीक-ठाक में
एक दिन दर्पण देखते हुए दुनियादार आदमी
अपनी मृत्यु के बारे में सोचता है
और रोने लगता है

डर सबसे पहले
दुनियादार आदमी के हृदय में
प्रवेश करता है।

 

*****

 

June 18, 2008

कराह सुनकर

Filed under: 1 — PRIYANKAR @ 12:43 pm

अष्टभुजा शुक्ल की एक कविता

 

मृत्यु

 

कराह सुनकर

जो न टूटे

नींद नहीं,

मृत्यु है

 

चाहे जितना थका हो आदमी

और चाहे जब सोया हो ।

 

********

 

काव्य संकलन ‘दुःस्वप्न भी आते हैं’ से साभार

तस्वीर : प्रभात खबर से साभार

 

June 17, 2008

एक कम है

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 7:38 am

कुमार अम्बुज की एक कविता

 

एक कम है

 

अब एक कम है तो एक की आवाज कम है

एक का अस्तित्व एक का प्रकाश

एक का विरोध

एक का उठा हुआ हाथ कम है

उसके मौसमों के वसंत कम हैं

 

एक रंग के कम होने से

अधूरी रह जाती है एक तस्वीर

एक तारा टूटने से भी वीरान होता है आकाश

एक फूल के कम होने से फैलता है उजाड़ सपनों के बागीचे में

 

एक के कम होने से कई चीजों पर फ़र्क पड़ता है एक साथ

उसके होने से हो सकनेवाली हजार बातें

यकायक हो जाती हैं कम

और जो चीजें पहले से ही कम हों

हादसा है उनमें से एक का भी कम हो जाना

 

मैं इस एक के लिए

मैं इस एक के विश्वास से

लड़ता हूं हजारों से

खुश रह सकता हूं कठिन दुःखों के बीच भी

 

मैं इस एक की परवाह करता हूं ।

 

*******

 

 ( नंदकिशोर नवल और संजय शांडिल्य द्वारा संपादित कविताओं के संकलन ‘संधि-वेला’ से साभार )

 

June 16, 2008

सहमति

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 10:01 am

अष्टभुजा शुक्ल की एक कविता

 

सहमति

 

भाग रहा हूं निपट अकेला

खोज रहा   उस साथी को

दोनों हाथों में सहमति हो

तो कस लेंगे   हाथी को ।

 

*****

 

काव्य संकलन ‘दुःस्वप्न भी आते हैं’ से साभार

तस्वीर : प्रभात खबर से साभार

 

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