अटपटा छंद
भारतवर्ष उदय
भारतीयता अस्त
रोयां-रोयां कर्जजाल में
नेता-नागर मस्त
ब्रह्मज्ञानी बिरहमन
इश्क-दीवाना दरवेश
बाज़ार का बाना
साधू का वेश
जनेऊ से कमर का खुजाना
मोरछल से लोबान का उड़ाना
मोबाइल पर नए क्लाइंट से बतियाना
जगत सत्यं ब्रह्म मिथ्या
घृतम पिवेत ऋणम कृत्वा
उधार प्रेम का फ़ेवीकोल
बीच बाज़ारे हल्ला बोल
द ग्रेट इंडियन शादी-बाज़ार
कन्या में डर
माथे पर प्राइस टैग
सजे-धजे वर
बनी की अंखियां सुरमेदानी
बनी का बाप कुबेर
थाम हाथ में स्वर्ण-पादुका
दूल्हे को ले घेर
नदिया गहरी
नाव पुरानी
बरसे पैसा
नाच मोरी रानी
बीच भंवर में बाड़ी
बाड़ी में बाज़ार
चौराहे पर चारपाई
आंगन में व्यापार
अपलम-चपलम गाड़ी
बैकसीट पर प्यार
माया ठगिनी रूप हज़ार
लंपट तेरी जयजयकार
आजा मेरे सप्पमपाट
मैं तनै चाटूं तू मनै चाट
देवल चिने अजुध्या नगरी
मन का मंदिर सूना
घट-घट वासी राम के
अंतर को दुख दूना ।
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इतनी सुंदर सारगर्भित रचना को अटपटा नाम देना ही बड़ा अटपटा है. प्रशंसात्मक शब्द नहीं हैं कि ठीक ठीक न्याय कर सकूँ. बहुत सुन्दर, प्रसंगिक, सार्थक, सटीक… और क्या क्या कहूं? अटपटा छंद चटपटा, लटपटा और स्वाभाविक सरस है क्योंकि रचनाकार प्रियंकर है
By: सुरेन्द्र वर्मा on October 5, 2009
at 12:30 pm