प्रियंकर की कविता / प्रतीत्य समुत्पाद

 

प्रतीत्य समुत्पाद

 

भाषा चाहिए , संस्कृति नहीं

पूंजी चाहिए , संस्कृति नहीं

बहुराष्ट्रीय बाज़ार चाहिए , संस्कृति नहीं

भूमंडलीकृत व्यापार चाहिए , संस्कृति नहीं

 

पैंट के साथ कमीज़ चाहिए

कमीज़ के साथ शमीज़

आकाश को मापने का हौसला चाहिए

इस महामंडी में मिल सके तो

चाहिए पृथ्वी पर मनुष्य की तरह

रहने की थोड़ी-बहुत तमीज़

 

सकल भूमंडल की विचार-यात्रा के लिए

चाहिए एक यान

– हीन या महान

प्रतीत्य समुत्पाद की समकालीन व्याख्या के लिए

एक अदद बुद्ध चाहिए

 

करघे पर बैठा कबीर व्यस्त हो

तो शायद कुछ काम आ सके

चरखेवाला काठियावाड़ी मोहनदास

आभासी यथार्थ की दुनिया में

बहुत मुश्किल है समझना प्रतीत्य समुत्पाद । 

 

******

 

Responses

  1. Wah……….

  2. बहुत सुंदर

    By: SHUAIB on September 1, 2006
    at 11:54 am

    विचार करने को प्रेरित करने वाली कविता है!वैसे ‘प्रतीत्य समुत्पाद ‘के मायने क्या हैँ?

    By: Rachana on September 1, 2006
    at 12:08 pm

    शुएब और रचना , आपके प्रति आभार व्यक्त करता हूं .

    ‘प्रतीत्य समुत्पाद’ अथवा ‘पतीच्च समुप्पाद’ बौद्ध दर्शन से लिया गया शब्द है . इसका शाब्दिक अर्थ है – एक ही मूल से जन्मी दो अवियोज्य/इनसेपरेबल चीज़ें – यानी एक को चुनने के बाद आप दूसरी को न चुनने के लिए स्वतंत्र नहीं रह जाते . यानी एक को चुनने की अनिवार्य परिणति है दूसरी को चुनना . भूमंडलीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के संदर्भ में मुझे यह शब्द बहुत भाया और मैंने इसका कविता में प्रयोग किया . क्योंकि बहुत से विद्वान यह कहते रहते हैं कि हम ‘यह’ तो लेंगे पर ‘वह’ नहीं लेंगे . पर आप जिसका पैसा लेंगे उसका पूरा पैकेज़ (भाषा-संस्कृति-रहन सहन) आपको लेना होगा . जब आप ‘यह’ लेते हैं तो ‘वह’ भी उसके साथ अनिवार्य रूप से आता है . आशा है मैं अपनी बात आप तक पहुंचा सका हूं .

    By: प्रियंकर on October 5, 2006
    at 7:19 am

    प्रियंकर जी बहुत धन्यवाद विस्तृत रूप से समझाने का.मैने इतने दिनों तक उत्तर नही मिलने से उम्मीद छोड दी थी ! लेकिन आज ये जानकारी पाकर खुश हूँ.फिर से धन्यवाद.

    By: rachanabajaj on October 13, 2006
    at 8:12 am

    I impressed with your kavita that Ek adad Buddh chahiye. Your Kavita realy touched the imotion of human being when we entering in globlization. We have to decide our values and right culture & heritage which followed everyone in all over the world

    Arun Kumar Gautam

    By: Arun Kumar Gautam on December 19, 2007
    at 12:54 pm

    Priyankarji, Bhediye kavita achchi lagi.Aapki drishti vyapak hai aur anubhav bhi.
    Net par abhi naya hoon, apna email id bhejen.Badhai.

    By: raag telang on March 26, 2009
    at 8:03 am


Leave a response

Your response: