अनहद नाद

प्रियंकर/वृष्टि-छाया प्रदेश का कवि

 

वृष्टि-छाया प्रदेश  का कवि

 

मैं हाशिये का कवि हूं

मेरी आत्मा के राग का आरोही स्वर

केन्द्र के कानों तक नहीं पहुंचता

पर पहुंच ही जाते हैं मुझ तक 

केन्द्र की विकासमूलक कार्य-क्रीड़ाओं के अभिलेख

 

 केन्द्र के अपने राजकीय कवि हैं

–  प्यारे ‘पोएट लॉरिएट’ 

केन्द्रीय मह्त्व के मुद्दों पर

पूरे अभिजात्य के साथ

सुविधाओं का अध्यात्म रचते

जनता के सुख-दुख की लोल-लहरों से  

यथासंभव मिलते-बचते

 

हाशिए के इस अनन्य राग के

विलंबित विस्तार में

मेरे संगतकार हैं

 जीवन के पृष्ठ-प्रदेश में

 करघे पर कराहते बीमार बुनकर

रांपी टटोलते बुजुर्ग मोचीराम

गाड़ी हांकते गाड़ीवान 

खेत गोड़ते-निराते

 और निश्शब्द

 उसी मिट्टी में

गलते जाते किसान

 

मेरी कविता के ताने-बाने में गुंथी है

उनकी दर्दआमेज़ दास्तान

दादरी से सिंगूर तक फैले किसानों का

विस्थापन रिसता है मेरी कविता से

उनके दुख से भीगी सड़क पर

मुझसे कैसे चल सकेगी

एक लाख रुपये की कार

 

निजीकरण और मॉलमैनिया के इस

मस्त-मस्त समय में

देरी   दूरी  और  दहशत   के बावजूद

 सार्वजनिक वाहन के भरोसे बैठे

वृष्टि-छाया प्रदेश  के कवि को

  अपने पैरों पर भरोसा

    नहीं छोड़ना चाहिये ।

 

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