Posted by: PRIYANKAR | दिसम्बर 6, 2006

संजय कुंदन की एक कविता

यमुना तट पर छठ

 

 

इस नदी की सांसें लौट आई हैं

इसकी त्वचा मटमैली है

मगर पारदर्शी है इसका हृदय

इसकी आंखों में कम नहीं हुआ है पानी

 

घुटने भर मिलेगा हर किसी को पानी

लेकिन पूरा मिलेगा आकाश

छठव्रतियों को

 

परदेश में छठ करते हुए

मन थोड़ा भारी हो रहा है

महिलाओं का

 

दिल्ली में बहुत दूर लगती है नदी

सिर्फ़ गन्ने के लिए

या सिंघाड़े के लिए

लंबा सफ़र तय करना पड़ता है

 

अपना घर होता

तो दरवाजे तक पहुंचा जाता कोई सूप

गेहूं पिसवा कर ला देता

मोहल्ले का कोई लड़का

मिल-बैठ कर औरतें

मन भर गातीं गीत

 

गंगा नहीं है तो क्या हुआ

गांव की छुटकी नदी नहीं है तो क्या हुआ

यमुना तो है

हर नदी धड़कती है दूसरी नदी में

जैसे एक शहर प्रवाहित होता है

दूसरे शहर में

 

पर सूरज एक है

सबका सूरज एक

 

हे दीनानाथ !

हे भास्कर !

अर्घ्य स्वीकार करो

 

वह शहर जो पीछे छूट गया है

वह गांव जो उदास है

वे घर जिसमें बंद पड़े हैं ताले

जहां कुंडली मारे बैठा है अंधेरा

वहां ठहर जाना

अपने घोड़ों को कहना

वे वहां रुके रहें थोड़ी देर

 

हे दिनकर !

यह नारियल   यह केला   यह ठेकुआ

सब तुम्हारे लिए है

सब तुम्हारे लिए ।

 

**********

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

कवि परिचय :  

हिंदी के विशिष्ट युवा कवि,कहानीकार और पत्रकार .  दिल्ली/गाज़ियाबाद में रहते हैं .


Responses

  1. बहुत बढ़ियां और आपको प्रस्तुति के लिये साधुवाद.

  2. धन्यवाद आपके लिए है।

  3. Bahut sundar kavita hai ..

  4. Poem touches my heart.

  5. बहुत धन्यबाद … और छठ पर्व की आपको और आपके प्रियजनों को शुभकामनाएँ ..

    छठ पर्व पर मेरे भी लिखे कुछ अनुभव देखें :
    http://pankaj-writes.blogspot.com/2010/11/hum-to-bihari-hain-doobte-surya-ko.html


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