Posted by: PRIYANKAR | दिसम्बर 22, 2006

प्रियंकर की एक कविता (साभार:जनसत्ता वार्षिकी- 2001)/दीपावली अंक

कहता है गुरु ग्यानी

 

वे कहते हैं
कविता को प्रकाश-स्तंभ
की तरह होना चाहिए
एक सच्चे सार्वभौम
विचार को क्रांति का
बीज बोना चाहिए
 
कहां है सागर
किस ओर से आते हैं जहाज
उन्हें नहीं पता
किस दिशा में है शत्रु
वे नहीं बताते

वे जिनके कटोरदान
में बंद है
हमारी उपजाऊ धरती
जो हवा की बीमारी
के कारक हैं
अनापत्ति प्रमाणपत्र
लहराते हुए हाज़िर हैं
एक बेहतरीन योजना
के साथ
नदी के पाट को
चिकनी-चौड़ी सड़क में
कैसे बदला जाए

पैसे और प्रौद्योगिकी को
बहंगी में लादे फेरीवाले
गली-गली घूम रहे हैं
एक से एक कारगर योजनाएं
वाजिब दाम पर उपलब्ध हैं
तमाम बुद्धिजीवी, प्रौद्योगिकीजीवी,परजीवी                                                                                                       
इन बाजार-चतुर
नवाचारियों की दक्षता पर मुग्ध हैं
दुलहिनें लगातार मंगलाचार गा रही हैं

खबर है
जब हिंद और
प्रशांत महासागर
कचरे से पट जाएंगे
बहुत कम लागत में
अमेरिका तक
सड़क यातायात संभव होगा
गर्म कोलतार में
पैसे की गंध सूंघते
लकड़सुंघवे लड़ रहे हैं
यह कारों की बंपर फसल
का ऐतिहासिक क्षण है ।

एक जादूई भाषा में
बाइबल की तर्ज पर
वायबल-वायबल
जैसा कोई मंत्र बुदबुदाते हुए
जब वे “गरीबी की संस्कृति”
के खिलाफ
कुछ बोलते हैं
“सांस्कृतिक गरीबी” के
कई पाठ खुलते हैं

सुविधाओं में सने संत उच्चार रहे हैं
पृथ्वी और नदी को
मां कहना चाहिए
सरस्वती के स्मरण मात्र से                                                                             जैसे अह्लादित होता था                                                                        ऋग्वैदिक   ऋषि                                                                                               
कुछ वैसी ही खुशी का
इजहार करना चाहिए

पल-पल बदलती
पटकथा वाले इस नाटक में
एक कवि की क्या भूमिका हो सकती है
साइक्लोप्स अनगिनत आंखों से
घूर रहा है
अंधेरा बढ़ चला है
धुंध और धुएं से भरे
समय में
प्रत्यंचा सी तनी है कविता ।

 

*********


Responses

  1. वाह, वाह…प्रियंकर जी। बहुत प्रभावशाली और सटीक प्रहार करने वाली कविता है।

  2. सुविधाओं में सने संत उच्चार रहे हैं
    पृथ्वी और नदी को
    मां कहना चाहिए
    सरस्वती के स्मरण मात्र से जैसे
    अह्लादित होता था ऋग्वैदिक ऋषि कुछ वैसी ही खुशी का
    इजहार करना चाहिए

    –बहुत खुब.

  3. बहुत सुन्दर ! भावों की अभिव्यक्ति तारीफ़े काबिल है !

  4. वा‍ह प्रियकंर जी, क्‍या लिखा है।

  5. Lovely

  6. ताने रहिए प्रत्यंचा!दिशा कभी सिंगूर की भी होगी,उम्मीद है.

  7. वाह प्रियंकर जी;
    बहुत बहुत भावप्रद कविता है.
    छू गई

  8. ताने रहिये बन्धु.. बीच-बीच में चला भी दीजियेगा.. एक-आध आँख तो फूटे ससुरे की..


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