Posted by: PRIYANKAR | अप्रैल 5, 2007

मत हँसो पाँचाली ……

प्रियंकर की एक कविता 

 

 

मत हँसो पांचाली

 

मत हँसो पांचाली
इतना भी मत हँसो
यह वो हँसी नहीं
जो सुख की शांति की उद्गम है
आस्था के सुवासित अक्षांशों से आती
मैत्री की मधुर सरगम है

” नायिका के हँसते ही
खिलते हैं चारों ओर फूल
बिखर जाते हैं सफेद मोती
चाँदनी में नहाते हैं
नदी के दोनों कूल 
फैलता है चतुर्दिक स्वर्णिम उजास
उमगती है अंतर में वासन्ती प्यास  ”

यह कल्पना-विलास की उक्ति
रूमानी गल्प-कथाओं में ही शोभती है
सत्य का सुमेरु तो यही है देवि
तीक्ष्ण हास्य ही बनाता है
सुयोधन को दुर्योधन
ऐसी दाहक हँसी
महासमर ही भोगती है ।

 

**********


Responses

  1. तीक्ष्ण हास्य ही बनाता है
    सुयोधन को दुर्योधन
    ऐसी दाहक हँसी
    महासमर ही भोगती है ।

    बहुत अच्छा लिख है

  2. बहुत बढिया !

  3. महासमर की विदूषी नायिका की हँसी मत रोकिये ।

  4. सत्य का सुमेरु तो यही है देवि
    तीक्ष्ण हास्य ही बनाता है
    सुयोधन को दुर्योधन
    ऐसी दाहक हँसी
    महासमर ही भोगती है ।

    बढ़िया लिखा!

  5. बहुत अच्छी है

  6. अच्छा लिखा है

  7. बहुत अच्छा!

  8. ‘basanti pyaas ‘aur ‘mahasamar hi BHOGTI hai’.
    in panktiyon ne dhyan aakrashit kiya….waise main kavita se paidal huin…yaron ka manna hai ke baki chijo ka bhi koi praman uplabdha nahi hai.. khair…ya ke baharhal…
    aapne likha hai to kuchh soch kar hi likha hoga kyonki aapko main chokanna lekhak manta hun…phir bhi ise elaborate kiya jana chahiye…basanti ko. aur bhogne ko to aapne naye tarike se impregnate kiya hai with metaphor..charchit arth iska normally dusra niklata hai.phir yaad dila dun ki kavita me main paidal hun…yaaron ka…

  9. Priyankerji,
    Please visit my website http://www.nareshagarwala.com from where you can download my 6 poetry books. If you wish you can also choose my poems for this blog.

    Thanks,

    Naresh Agarwala

  10. “avisamrniy panktiyan ”
    यह कल्पना-विलास की उक्ति
    रूमानी गल्प-कथाओं में ही शोभती है
    सत्य का सुमेरु तो यही है देवि
    तीक्ष्ण हास्य ही बनाता है
    सुयोधन को दुर्योधन
    ऐसी दाहक हँसी
    महासमर ही भोगती है ।


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