Posted by: PRIYANKAR | मई 14, 2007

पढी हुई किताबें

राजीव कुमार शुक्ल की एक कविता

 

 

पढी हुई किताबें

 

हमारे घर

पहली बार आया था

दोस्त मेरा बड़ा पुराना

नन्हीं बिटिया के करतब

बखान रही थी पत्नी

विस्मय-प्रसन्न दोस्त के आगे

 

सबसे ज्यादा तो

पुलकती है यह भाई साहब

इस आलमारी में रखी

किताबों को देख-देख

हां,कहती है

मां,ये सब पढूंगी मैं

मुस्कुराती व्याख्या की दोस्त ने

 

नहीं!

छलक कर बात काटी पत्नी ने

यह तो ऐसे हंसती है दुष्ट

कहती हो जैसे

मां,ये सब किताबें तो

पढी हुई हैं मेरी ।

 

*************

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )


Responses

  1. क्या बात है!🙂

  2. अच्छी कविता …धन्यवाद

  3. 🙂

  4. 🙂 vah!

  5. बढ़िया!! 🙂

  6. अच्छी है ।

  7. उम्दा अभिव्यक्ति है!!


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