Posted by: PRIYANKAR | मई 18, 2007

केवल एक बात थी

कीर्ति चौधरी की एक कविता

 

 

केवल एक बात थी

 

केवल एक बात थी

कितनी आवृत्ति

विविध रूप में करके तुमसे कही

 

फिर भी हर क्षण

कह लेने के बाद

कहीं कुछ रह जाने की पीड़ा बहुत सही

 

उमग-उमग भावों की

सरिता यों अनचाहे

शब्द-कूल से परे सदा ही बही

 

सागर मेरे !    फिर भी

इसकी सीमा-परिणति

सदा तुम्हीं ने भुज भर गही, गही ।

 

*************

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )


Responses

  1. प्रियंकर जी,सुन्दर रचना है-

    केवल एक बात थी

    कितनी आवृत्ति

    विविध रूप में करके तुमसे कही

  2. एक अजीब कसक है इस कविता में. बधाई शब्दों में इस तरह भाव लाने के लिये.

  3. अच्छी रचना …गहरे भाव

  4. आदम हूं चिड़ि‍या हूं क्‍या मालूम क्‍या हूं.. हवाओं में होता चला आया हूं..
    यहां हमारे सिनेमा के ब्‍लॉग वाला आलम ही है.. भूले-भटके मुसाफ़ि‍र आते हैं.. आपकी निष्‍ठा व समपर्ण पर दो फूल चढ़ाते हैं.. मैं भी चढ़ा रहा हूं- उत्‍साह बनाए रखिए!

  5. अच्छी लगी ये रचना !

  6. अच्छी अभिव्यक्ति है!

  7. Hi Friend…..

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