Posted by: PRIYANKAR | जुलाई 20, 2007

विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता

 

कोई अधूरा पूरा नहीं होता

 

कोई अधूरा पूरा नहीं होता

और एक नया शुरू होकर

नया अधूरा छूट जाता

शुरू से इतने सारे

कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते

 

परंतु इस असमाप्त —

अधूरे से भरे जीवन को

पूरा माना जाए, अधूरा नहीं

कि जीवन को भरपूर जिया गया

 

इस भरपूर जीवन में

मृत्यु के ठीक पहले भी मैं

एक नई कविता शुरू कर सकता हूं

मृत्यु के बहुत पहले की कविता की तरह

जीवन की अपनी पहली कविता की तरह

 

किसी नए अधूरे को अंतिम न माना जाए ।

 

********

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )


Responses

  1. विनोद जी अप्रतिम है.. मगर उनकी कविता अधिक निखरती है उनके गद्य लेखन में.. उनके उपन्यासों में..

  2. बहुत खूब!!

    आभार!!

  3. अब जाकर ब्लॉग की दुनिया अपनी लगी है

  4. बहुत अच्छी कविता है। विनोद जी मेरे प्रिय कवि और लेखक हैं। उनसे रायपुर में 4-5 बार मिल भी चुका हूँ। मैं स्वयं भी रायपुर का ही हूँ।

  5. विनोद जी की कविता अद्भुत होती है । शुक्रिया इस कविता के लिए । मुझे उनकी ‘अधिक कुछ नहीं’ कविता बहुत पसंद है ।

  6. agpy7toyolylyp;9p8gkohdjhrjhrdhhejhrrjrjr

    sfxgregdrggge btryyryy45352tur6iuryhrubghubjyihu


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