Posted by: PRIYANKAR | जुलाई 22, 2007

एक पड़ोसी की प्रार्थना में

 

विनोद कुमार शुक्ल की  कविता –  ॥2॥

 

जब बाढ़ आती है

तो टीले पर बसा घर भी

डूब जाने को होता है

पास, पड़ोस भी रह रहा है

मैं घर को इस समय धाम कहता हूं

और ईश्वर  की प्रार्थना में  नहीं

एक पड़ोसी की प्रार्थना में

अपनी बसावट में आस्तिक हो रहा हूं

कि किसी अंतिम पड़ोस से

एक पड़ोसी बहुत दूर से

सबको उबारने

एक डोंगी लेकर चल पड़ा है

 

घर के ऊपर चढाई पर

मंदिर की तरह एक और पड़ोसी का घर है

 

घर में दुख की बाढ़ आती है ।

 

***********

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )


Responses

  1. प्रेषित रचना बहुत बढिया है।एक सजीव चित्रण है।

  2. बढ़िया!!

    आभार!!

  3. इस रचना को पढ़ना एक अलग अनुभूति है. गहरी रचना.

  4. ये किसकी तस्वीर लगा दी. ये सुप्रसिद्ध कवि, कथाकार, उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल की तस्वीर नहीं है.

  5. भैये गोपाल बाबू पिनक में हो क्या ? कहां की तस्वीर और कैसी तस्वीर ? कोई दिव्य-दृष्टि पाई है क्या ?

  6. किसकी तस्वीर है भाई।


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