Posted by: PRIYANKAR | सितम्बर 20, 2007

प्रियंकर की एक कविता

Priyankar

प्रेम पत्र

 

कागज की नाव पर
तुम नहीं आ सकतीं
पर आ सकते हैं
तुम्हारे शब्द
नि:शब्द

सुबह की उजली
नर्म धूप की तरह
मन के आंगन में
उतर आता है
तुम्हारा स्नेह
कुछ यूं कि
जैसे झरते हों
रजनीगंधा के सूखे फूल
आहिस्ता से

 

फूल शुभकामना के
जिन्हें तुम
भेजती हो धड़कते हृदय से
मैं भी स्वीकारता हूं
कंपकंपाती अंजुरियों से ही

स्वीकार्य के बाद ही
तो आती है वह शक्ति      

जिसके लिए विख्यात हैं
मनु के वंशज

 

स्नेह का स्वीकार्य
ही तो हर सकता है
जीवन के सब
दाह दंश पीड़ा और शूल
स्नेह का स्वीकार्य ही तो
सिखा सकता है
बहना धारा के प्रतिकूल

आज समझा हूं
अभिव्यक्ति की
इस सच्चाई को 
कि क्षण चाहे अजर-अमर
न भी हों
पूर्ण होते हैं
सेतु चाहे कागज के हों
महत्वपूर्ण होते हैं ।

 

जब सब कुछ सीमाओं में कैद हो
तब भी  आ सकते हैं
बिना किसी पारपत्र के
मेरे ठोस शब्दों के उत्तर में
तुम्हारे वे तरल शब्द
मेरे जटिल प्रश्नों के उत्तर में
तुम्हारे वे सरल शब्द ।
  

     ********

 


Responses

  1. स्नेह का स्वीकार्य
    ही तो हर सकता है
    जीवन के सब
    दाह दंश पीड़ा और शूल
    स्नेह का स्वीकार्य ही तो
    सिखा सकता है
    बहना धारा के प्रतिकूल

    बहुत सुंदर्……॥

  2. बेहद पसंद आई…बहुत सुंदर।

  3. आज समझा हूं
    अभिव्यक्ति की
    इस सच्चाई को
    कि क्षण चाहे अजर-अमर
    न भी हों
    पूर्ण होते हैं
    सेतु चाहे कागज के हों
    महत्वपूर्ण होते हैं ।

    जब सब कुछ सीमाओं में कैद हो
    तब भी आ सकते हैं
    बिना किसी पारपत्र के
    मेरे ठोस शब्दों के उत्तर में
    तुम्हारे वे तरल शब्द
    मेरे जटिल प्रश्नों के उत्तर में
    तुम्हारे वे सरल शब्द ।

    बहुत सुंदर….!

  4. आज समझा हूं
    अभिव्यक्ति की
    इस सच्चाई को
    कि क्षण चाहे अजर-अमर
    न भी हों
    पूर्ण होते हैं
    सेतु चाहे कागज के हों
    महत्वपूर्ण होते हैं ।
    आप कल्पना को बहुत खूबसूरती से बाँधते हैं, अनुपम रचना.

  5. एक बेहद सुन्दर कविता । शब्द अपनी सम्पूर्ण निष्ठा के साथ सीधे के सीधे दिल में उतर गये।
    बधाई स्वीकार करें ।
    कभी समय मिले तो ईकविता ( http://launch.groups.yahoo.com/group/ekavita/ )
    की तरफ़ ध्यान दीजिये !!!

  6. स्वीकार्य के बाद ही
    तो आती है वह शक्ति

    जिसके लिए विख्यात हैं
    मनु के वंशज

    उक्त पंक्तियां समझ नहीं आई… प्रश्न कौंध रहे हैं मेरे.. समाधान करें neerajdiwan at gmail

  7. अच्छी कविता के लिए बधाइयाँ।

  8. सुन्दर कोमल ईमानदार कविता-तारीफ मे हमारे शब्द-निःशब्द!!

  9. बहुत ही सुंदर रचना !

  10. प्रियंकर जी,

    बहुत ही सरल ,सहज किन्तु प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है आपकी इस कविता में…कविता का केन्द्र बिन्दू ’प्रेम’ को बहुत ही सूक्ष्मता से उकेरा है आपने…बात बहुत गहरी है..समझने वाले समझ जायेंगे….विशेष कर ये पंक्तियां दिल को छू गईं…..बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं….

    जब सब कुछ सीमाओं में कैद हो
    तब भी आ सकते हैं
    बिना किसी पारपत्र के
    मेरे ठोस शब्दों के उत्तर में
    तुम्हारे वे तरल शब्द
    मेरे जटिल प्रश्नों के उत्तर में
    तुम्हारे वे सरल शब्द ।

    ~~~~ डा. रमा द्विवेदी

  11. मेरे ठोस शब्दों के उत्तर में
    तुम्हारे वे तरल शब्द
    मेरे जटिल प्रश्नों के उत्तर में
    तुम्हारे वे सरल शब्द ।

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
    निःशब्द………

    बधाई…

    शुभकामनाएं

  12. स्नेह का स्वीकार्य
    ही तो हर सकता है
    जीवन के सब
    दाह दंश पीड़ा और शूल
    स्नेह का स्वीकार्य ही तो
    सिखा सकता है
    बहना धारा के प्रतिकूल

    bahut sundar kavita hai mamaji

  13. Dada how r u ? Good Poem . R U going to post some of my poems also? I have posted a poem in my blog singhreallysingh.wordpress.com. iska bhi kuchh prachar Karen. apne blog mein link de den.
    Thank you,
    Mahender

  14. mujhe ek din ise dekhna kholna band karna sikha den.to is bahane guftgu jari rahegi.csck nam se ek blog ko dekhe.
    vijay

  15. priyankar ji,
    aapki kavita achchhi lagi.
    mere blog-www.neelkamal1710.blogspot.com par visit kar sakte hain.
    -NEEL KAMAL

  16. I have gone through your poem anhad nad this evening and found it interesting.


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