Posted by: PRIYANKAR | मई 27, 2008

हल्लो राजा

युवा कवि राकेश रंजन की एक कविता

 

हल्लो राजा

 

हल्लो राजा !

कभी-कभी तो कठिन धूप में

चल्लो राजा !

कभी-कभी तो चिंता-भय से

गल्लो राजा !

कभी-कभी तो जठरागिन में

जल्लो राजा !

 

जब तिनके-भर सुख की खातिर

स्याह जंगलों-जैसे दुक्खों से जुज्झोगे

तब बुज्झोगे

परजा होना खेल नहीं है

किसी जनम में

इसका सुख से मेल नहीं है !

 

मैंने पूछा :

राजा, कैसी है तुकबंदी ?

राजा बोले :

बेहद गंदी !

 

******

 

( नंदकिशोर नवल और संजय शांडिल्य द्वारा संपादित नवीनतम पीढी के कवियों की कविताओं के संकलन ‘संधि-वेला’ से साभार )

 


Responses

  1. हैल्‍लो, हैल्‍लो.. थोड़ा रजवा को हिलाते रहना बुरा नहीं..

  2. वाह!!!

    ***राजीव रंजन प्रसाद

  3. सुंदर कविता है, बाबा की नागार्जुन की याद दिलाती हुई।

  4. ये हिस्सा यदि न भी हो तो भी कविता पूरी है और अच्छी भी.युवा कवि राकेश रंजन को ढेरों शुभकामनायें.
    मैंने पूछा :

    राजा, कैसी है तुकबंदी ?

    राजा बोले :

    बेहद गंदी !

  5. हैल्‍लो राजा
    चल्‍लो राजा ।।
    सुंदर कविता ।
    छा गये राजा ।।

  6. वाह. वाह.
    कवि ने बड़ी सुन्दरता से ख्याल व्यक्त किए है.
    बहुत अच्छे.

  7. वाह भैया ! एकदम मस्त.

  8. बहुत सही है।
    घुघूती बासूती

  9. कभी-कभी तो जठरागिन में
    जल्लो राजा

    -वाह, बहुत बढ़िया.

  10. बहुत बढ़िया …बधाई

  11. बाबा नागार्जुन की याद दिलाती है…….


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