Posted by: PRIYANKAR | जून 13, 2008

विरुद्ध कथा

 

एकांत श्रीवास्तव की एक कविता

 

विरुद्ध कथा

 

पहले भाव पैदा हुए

फिर शब्द

फिर उन शब्दों को गानेवाले कंठ

फिर उन कंठों को दबानेवाले हाथ

 

पहले सूर्य पैदा हुआ

फिर धरती

फिर उस धरती को बसानेवाले जन 

फिर उन जनों को सतानेवाला तंत्र

 

पहले पत्थर पैदा हुए

फिर आग

फिर उस आग को बचानेवाले अलाव

फिर उन अलावों को बुझानेवाला इंद्र

 

जो पैदा हुए, मरे नहीं

मारनेवालों के विरुद्ध खड़े हुए

हम फूल थे

पत्थर बने

कड़े   हुए

इस तरह इस धरती पर बड़े हुए ।

 

******


Responses

  1. बढ़िया…

  2. waah! bahut acchey

  3. इतनी अच्‍छी बोधक व बेधक कविता पढ़ाने के लिए धन्‍यवाद।

  4. शानदार कविता ।
    एकांत जी को हमारा नमस्‍कार भी पहुंचे ।

  5. तमाम अनिश्चितताओं के बीच उम्मीदों भरे शब्द जीवन की विरूद्दावली से बाहर निकाल देते हैं-
    जो पैदा हुए, मरे नहीं
    मारनेवालों के विरुद्ध खड़े हुए
    हम फूल थे/पत्थर बने/कड़े हुए
    इस तरह इस धरती पर बड़े हुए.

  6. वास्तव में यह है आठवां आश्चर्य – कि दबाने वाला/सताने वाला/बुझाने वाला के बावजूद है यह दुनिया।
    और “दबाने वाला/सताने वाला/बुझाने वाला” को कोष्ठक में बन्द करने का करती है यत्न, यह दुनिया सतत!

  7. कविता वाकइ इसी को कहते है ..सहज शब्द , सहज भाव लेकिन गूढ संदेश..लंबे चौडे विंब और खुद ही लिखना और सिफॆ खुद ही समझना वतॆमान दौर के लेखकों की आदत सी बन गयी है जिसे पाठक झेलता है ..बहुत सुंदर लगी आपकी कविता दिल से मेरी शुभकामनाओं को स्वीकार करें …

  8. बहुत उम्दा, वाह!

  9. वास्तव में यह है आठवां आश्चर्य – कि दबाने वाला/सताने वाला/बुझाने वाला के बावजूद है यह दुनियां।
    और “दबाने वाला/सताने वाला/बुझाने वाला” को कोष्ठक में बन्द करने का करती है यत्न, यह दुनियां सतत!

  10. क्या कहने एकांत जी…

  11. बहुत ही बेहतरीन कविता.
    इसे प्रस्तुत करने के लिए आपको साधुवाद.

  12. सुंदर कविता ….बधाई

  13. बहुत बढ़ियाँ और जानदार…


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