Posted by: PRIYANKAR | जुलाई 28, 2008

स्त्रियां

अनामिका की एक कविता

 

स्त्रियां

 

पढ़ा गया हमको
जैसे पढ़ा जाता है काग़ज
बच्चों की फटी कॉपियों का
‘चनाजोरगरम’ के लिफ़ाफ़े के बनने से पहले

 
देखा गया हमको
जैसे कि कुफ्त हो उनींदे
देखी जाती है कलाई घड़ी
अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद 

 
सुना गया हमको
यों ही उड़ते मन से
जैसे सुने जाते हैं फ़िल्मी गाने
सस्ते कैसेटों पर
ठसाठस्स ठुंसी हुई बस में 

 
भोगा गया हमको
बहुत दूर के रिश्तेदारों के दुख की तरह
एक दिन हमने कहा ––
हम भी इंसान हैं
हमें क़ायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर
जैसे पढ़ा होगा बी.ए. के बाद
नौकरी का पहला विज्ञापन

 
देखो तो ऐसे
जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है
बहुत दूर जलती हुई आग

 
सुनो, हमें अनहद की तरह
और समझो जैसे समझी जाती है
नई-नई सीखी हुई भाषा

 
इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई
एक अदृश्य टहनी से
टिड्डियाँ उड़ीं और रंगीन अफ़वाहें
चीखती हुई चीं-चीं
‘दुश्चरित्र महिलाएं, दुश्चरित्र महिलाएं ––
किन्हीं सरपरस्तों के दम पर फूली-फैलीं
अगरधत्त जंगल लताएं !
खाती-पीती, सुख से ऊबी
और बेकार-बेचैन, अवारा महिलाओं का ही
शग़ल हैं ये कहानियाँ और कविताएँ
फिर, ये उन्होंने थोड़े ही लिखीं हैं’
(कनखियाँ इशारे, फिर कनखी)
बाक़ी कहानी बस कनखी है

 
हे परमपिताओ,
परमपुरुषो ––
बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो !

 

****


Responses

  1. सुंदरतम और यथार्थ।

  2. is kavita ko naari kavita blog par daalney kii anumati kissaey milaegee

  3. अच्छा लिखा है।

  4. बहुत खूब ! बहुत सही !

  5. achchi hai

  6. अनामिका जी कविताएं हमेशा बाँध देती है…

  7. kya baat hai!!!aabhaar

  8. Anamika ji, Baat to aap thik kahti hain, par kavita likhna kab seekhengi? Aap to bas begaar si kaati hui lagti hain–jayse ki jaldi se kavita se pind chhoote to chain ki sans len!

  9. बहुत उम्दा!!

  10. नही , जो लिखा है एकदम सच लिखा है जैसे भोग हुआ सच
    ताजा ताजा घाव से खून का रिसना
    किन्तु………… पुरुष बख्शे हमे?
    हमने कब से उन्हें ये मौका दिया बाबु?
    यदि प्यार है तो इसकी जरूरत नही. यदि प्यार नही है तो इसकी जरूरत बिल्कूल भी नही.


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