Posted by: PRIYANKAR | मई 8, 2009

अपनी पीढी़ के लिए

 

अरुण कमल

अरुण कमल

 

 

अरुण कमल की एक कविता

 

 अपनी पीढी के लिए

 

वे सारे खीरे जिनमें तीतापन है हमारे लिए
वे सब केले जो जुड़वां हैं
वे आम जो बाहर से पके पर भीतर खट्टे हैं चूक
और तवे पर सिंकती पिछली रोटी परथन की
सब हमारे लिए
ईसा की बीसवीं शाताब्‍दी की अंतिम पीढी के लिए
वे सारे युद्ध और तबाहियां
मेला उखडने के बाद का कचडा    महामारियां
समुद्र में डूबता सबसे प्राचीन बंदरगाह
और टूट कर गिरता सर्वोच्‍च शिखर
सब हमारे लिए
पोलिथिन थैलियों पर जीवित गौवों का दूध हमारे लिए
शहद का छत्‍ता खाली                                                                                                                 हमारे लिए वो हवा फेफड़े की    अंतिम मस्‍तकहीन धड़
पूर्वजों के सारे रोग हमारे रक्‍त में
वे तारे भी हमारे लिए जिनका प्रकाश अब त‍क पहुंचा ही नहीं हमारे पास
और वे तेरह सूर्य जो कहीं होंगे आज भी सुबह की प्रतीक्षा में
सबसे सुंदर स्त्रियां और सबसे सुंदर पुरूष
और वो फूल जिसे मना है बदलना फल में
हमारी ही थाली में शासकों के दांत छूटे हुए
और जरा सी धूप में धधक उठती आदिम हिंसा

जब भी हमारा जिक्र हो कहा जाए
हम उस समय जिए जब
सबसे आसान था चंद्रमा पर घर
और सबसे मोहाल थी रोटी
और कहा जाए
हर पीढी़ की तरह हमें भी लगा
कि हमारे पहले अच्‍छा था सब कुछ
और आगे सब अच्‍छा होगा ।

 

*****


Responses

  1. ‘जब भी हमारा जिक्र हो कहा जाए
    हम उस समय जिए जब
    सबसे आसान था चंद्रमा पर घर
    और सबसे मुहाल थी रोटी’

    जानदार पंक्तियाँ!

  2. बहुत जबर्दस्त दमदार कविता। आज के वक्त और नई पीढ़ी का दमदार वक्तव्य भी है।

  3. क्या बतायें कितनी बौनी है हमारी पीढ़ी। समय के एक टापू में कैद, अपने को सर्वशक्तिमान मानती।

  4. भाई पढ़ कर लगा अब कुछ देर चुप रहूं ….. शुक्रिया !!


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