Posted by: PRIYANKAR | जून 3, 2009

विजयदेवनारायण साही की एक कविता

प्रार्थना : गुरु कबीरदास के लिए

परम गुरु
दो तो ऐसी विनम्रता दो
कि अंतहीन सहानुभूति की वाणी बोल सकूँ
और यह अंतहीन सहानुभूति
पाखंड न लगे ।

दो तो ऐसा कलेजा दो
कि अपमान, महत्वाकांक्षा और भूख
की गांठों में मरोड़े हुए
उन लोगों का माथा सहला सकूँ
और इसका डर न लगे
कि कोई हाथ ही काट खायेगा ।

दो तो ऐसी निरीहता दो
कि इस दहाड़ते आतंक के बीच
फटकार कर सच बोल सकूँ
और इसकी चिन्ता न हो
कि इस बहुमुखी युद्ध में
मेरे सच का इस्तेमाल
कौन अपने पक्ष में करेगा ।

यह भी न दो
तो इतना ही दो
कि बिना मरे चुप रह सकूँ ।

****

 


Responses

  1. Bahut bahut sundar sachchi sarthak prarthna…

  2. aisee abhiwyakti bahhut mushkil se padhane ko milataa hai ……bahut bahut badhaee

  3. एक दम यथार्थ अनुभूति व्यक्त कर रही है यह कविता।

  4. ati sunder.hriday ko sparsh karney wale bhaav.
    Dhanyavaad.

  5. अच्छी प्रस्तुति
    बधाई


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