Posted by: PRIYANKAR | जुलाई 15, 2009

आलोक श्रीवास्तव की कविता-1

 
 मूल्यांकन 

 

कविगण अमर होना चाहते हैं

समकालीन यथार्थ से टकराते-टूटते कविगण

कर रहे हैं समय का अनुवाद

लुटा-पिटा भारत उनकी भाषा में है

कस्बे के दुख हैं

महानगर की पीड़ाएं

उनके परिजन हैं

उनका प्यार है

 

कविगण दुखी नहीं हैं कि लोग क्यों नहीं

पढ़ पाते उनकी कविता

उनकी कविता क्यों नहीं बदल पाती समाज

या जीवन ही दो-एक का

 

उन्हें शिकायत चार आलोचकों

और चालीस पत्रिकाओं से है

जो कर नहीं रहीं

उनका मूल्यांकन ।

 

*****

 
(काव्य संकलन ’यह धरती हमारा ही स्वप्न है’ से साभार)
 

Responses

  1. अच्छा व्यंग्य।

  2. पता नहीं इस कविता है में क्या है…….. एक थका और घिसा सुर …खैर क्या कर सकते हैं…

  3. ’एक थका और घिसा सुर’ या मरचा ?

  4. o dear why did you delete my comment. perhaps you have not read— nindak niyre rakhiye——-ok——best of luck

  5. Dear Pandey ji,

    At this blog, we do not encourage anonymous comments or comments through fictitious names . If u prove ur identity or provide any link , I’ll be glad to publish even acidic & scathing comments . I have experienced that when we drop our name, we drop decency, too . Anonymity leads to irresponsibility & sadism, without being accountable .

    U’ll be glad to know that,still,I have not activated moderation . For I believe in the inherent goodness of man .

    regards,

    Priyankar


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