Posted by: PRIYANKAR | नवम्बर 26, 2009

विचार आते हैं !

मुक्तिबोध की एक छोटी कविता

विचार आते हैं

विचार आते हैं —

लिखते समय नहीं

लिखते समय नहीं

बोझा ढोते वक्त पीठ पर

सिर पर उठाते समय भार

परिश्रम करते समय

चाँद उगता है व

पानी में झलमलाने लगता है

हृदय के पानी में

विचार आते हैं

लिखते समय नहीं

… पत्थर ढोते वक्त

पीठ पर उठाते वक्त बोझ

सांप मारते समय पिछवाडे

बच्चे की नेकर पछीटते वक्त !!

पत्थर पहाड बन जाते हैं

नक्शे बनते हैं भौगोलिक

पीठ कच्छप बन जाती है

समय पृथ्वी बन जाता है …

*****

मुक्तिबोध की इस कविता का अंग्रेज़ी अनुवाद देखें :

Thoughts  Arrive

thoughts arrive
not while writing
while carrying load on back
while hauling weight over head
while toiling
moon rises and
shimmers on water
water of the heart

thoughts arrive
not while writing
…while carrying stone
while hauling load over back
while killing snake in the backyard
while washing a child’s knickers
stones become mountains
maps turn physical
backs turn into turtles
time becomes the earth…

*****

(English translation by Ghazala; courtesy : http://ghazala.wordpress.com)


Responses

  1. मुक्तिबोध की यह कविता मेरी प्रिय कविताओं में से है मै अनेक जगह इसे उद्ध्रत करता हूँ । विशेष रूप से गज़ाला का यह अनुवाद बहुत अच्छा बन पड़ा है यह कविता का अर्थ ठीक तरह से प्रकट कर रहा है ।

  2. बहुत आभार इसे पढ़वाने का.

  3. शुक्रिया इसे यहाँ बांटने के लिए ….

  4. विचार आने की बात भली कही मुक्तिबोध जी ने। कुछ अजीब मनमौजी होते हैं विचार। सयास आते नहीं, अनायास चले आते हैं।

  5. पर पृष्ठभूमि में बहुत मेहनत मांगते हैं विचार!

  6. मुक्तिबोध जी छोटी कविताएं बहुत कम ही लिखा करते थे..मगर उनमे से यह मेरी हमेशा सबसे प्रिय कविता रही..रचना-प्रक्रिया को फ़तांसी से नही वरन्‌ अनुभवजन्य कठोर यथारथों से जोड़ते हुए..गोया कि गर्म कढ़ी के स्वाद मे बटलोई का चुल्हे की आँच मे झुलसना घुला हुआ हो..अनुवाद भी पढ़ाने के लिये शुक्रिया!!

  7. विचार भौतिक परिस्थितियों से पैदा होते हैं। वे टपकते नहीं। इस बात को बहुत, बहुत ही कलात्मक रीति से कहा है मुक्तिबोध ने।

  8. विचार के उपासकों को आईना दिखाती एक उम्दा कविता…

  9. लाजवाब, सत्य और सत्य

  10. “पत्थर पहाड बन जाते हैं

    नक्शे बनते हैं भौगोलिक

    पीठ कच्छप बन जाती है

    समय पृथ्वी बन जाता है …”

    अच्छा लगा नवीन परिस्थितियों और पुरातन अंतरिक्ष विज्ञान का मेल!


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