Posted by: PRIYANKAR | जुलाई 17, 2011

अनुराग वत्स की एक कविता

अनुराग वत्स

गिनती

अब जब कहीं कुछ नहीं की साखी है तो तुम्हारा
जानबूझकर मेरे पास भूल गया क्लचर है.
मैं उससे आदतन खेलता हूँ, मगर एहतिहात से
कि कहीं तुम्हारी आवाज़ बरज ना दे.
और टूट गया तो तुम्हारी तरह वैसा ही मिलना नामुमकिन.

हुमायूँ’ज टॉम्ब, शाकुंतलम थियेटर और परांठे वाली गली
तुम साथ ले गई. अब वे मेरी याद के नक़्शे में हैं, शहर दिल्ली में कहीं नहीं.

यूथ भी.
उसे अकेले पढ़ना असंभव होगा मेरे लिए.

मेरा हरा कुर्ता हैंगर का होकर रह गया है.
मानो उसे तुम्हारे हाथों ने दुलारा ही नहीं.

आसमानी अदालत में मुझे मुजरिम करार दिया गया है.
सज़ा बरसात की सुनाई गई है…हद है!
…आगे कोई अपील नहीं…

सच पूछो तो तुम्हारा एसारके मुझे चिढ़ाता है.
हालाँकि मैं रोमन हॉलीडे चाव से देख सकता हूँ.

फिर भी मैं आजिजी में नहीं, बहुत इत्मिनान में फ्लोरेंतिनो अरिज़ा के
५३ साल, ७ महीने और ११ दिन-रात को अपना मुकम्मल ठिकाना बना रहा हूँ.
पर इतनी उम्र मिलेगी फरमीना ?

***

अनुराग वत्स की और कविताएं यहां पढ़ें :

http://vatsanurag.blogspot.com/2011/01/blog-post_27.html


Responses

  1. बेहतर…

  2. बेहतरीन।

  3. एक बहुत अच्छी कविता के लिए अनुराग को बधाई…

    मेरा हरा कुर्ता हैंगर का होकर रह गया है.
    मानो उसे तुम्हारे हाथों ने दुलारा ही नहीं.

    आसमानी अदालत में मुझे मुजरिम करार दिया गया है.
    सज़ा बरसात की सुनाई गई है…हद है!
    …आगे कोई अपील नहीं…

    बेहतरीन…..

  4. मेरा हरा कुर्ता हैंगर का होकर रह गया है.
    मानो उसे तुम्हारे हाथों ने दुलारा ही नहीं.

    आसमानी अदालत में मुझे मुजरिम करार दिया गया है.
    सज़ा बरसात की सुनाई गई है…हद है!
    …आगे कोई अपील नहीं…

    अच्छी पंक्तियाँ ………..इन पांच पंक्तियों में वाकई कमाल कर दिया है …बधाई ..


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