Posted by: PRIYANKAR | नवम्बर 1, 2011

मोहन श्रोत्रिय की एक कविता

 

 

 

 

 

हमारे समय की प्रार्थनाएं 

नदियो !
तुम यों ही बहती रहो 
धरती को सींचती हरा-भरा 
करती 
मनुष्‍यों और शेष 
जीव जगत के जीवन को 
सुनिश्चित करती। 

पर्वतो !
तुम यों ही अड़े रहो
विविधतामय वन‍स्‍पति को 
धारण करते हुए 
बादलों से मित्रता को पुख्‍़ता रखते हुए। 

बादलो !
तुम गरजो चाहे जितना भी 
बरसते रहो 
इतना-भर ज़रूर कि 
ताल-तलैया लबालब रहें 
कुएं ज्‍़यादा लंबी रस्‍सी 
की मांग न करें। 

सूर्य !
तुम प्रकाश और ऊष्‍मा का 
संचार करते रहो
धरती को हरा-भरा रखो 
फूलों को खिलाओ 
उन्‍हें रंग दो- गंध दो 
और फलों को रस से 
मालामाल करते रहो। 

धरती मां !
हमें धारण करती रहो 
पर हां हमें 
तुम्‍हारे लायक़ यानि 
बेहतर मनुष्‍य 
बनते चले जाने को 
प्रेरित करती रहो 
कभी-कभी दंडित भी करो 
लेकिन प्‍यार बांटती रहो 
अबाध और अनवरत 
हमारी अंजुरि ख़ाली न रहे। 

और समुद्र !
तुम 
निरंतर उथले 
होते जा रहे 
हम मनुष्‍यों को 
थोड़ी अपनी गहराई 
देते चलो।

****


Responses

  1. ठहराव जब भी..जहां भी…होता है…सुक़ून देता है….प्रार्थना….स्वयं ठहराव है…..विनम्र आग्रहों को समेटे….सरस काव्य हेतु आभार..!

  2. प्राकृतिक कर्तव्यों को याद दिलाती कविता।

  3. और समुद्र !
    तुम
    निरंतर उथले
    होते जा रहे
    हम मनुष्‍यों को
    थोड़ी अपनी गहराई
    देते चलो।
    ==

    बहुत खूब

  4. बहुत सुन्दर कामना है। भगवान करे यह पूरी हो।
    हम अपने पर्यावरण को प्यार करें तो जरूर…

    अच्छी कविता पढ़वाने का आभार।

  5. हे प्रियंकर!
    ऐसे ही प्रस्तुत करते रहो
    वह जो पढ़ें तो लगे
    कि कुछ पढ़ा
    छिछला नहीं, गहरा

  6. इस कविता को पढकर लग रहा है जैसे वैदिककाल के ऋषियों की ऋचाओं का पाठ कर लिया .ऋषि प्रवर मोहन श्रोत्रिय जी का आभार .

  7. prakarti ki itni achhi prarthana khabi nahi padi. Badhai Mohan Ji

  8. Reblogged this on sapekchha.


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