Posted by: PRIYANKAR | अगस्त 8, 2014

असअद बदायुनी की एक गजल

मेरी  अना  मेरे  दुश्मन  को ताज़ियाना  है
इसी चराग  से  रौशन  गरीब-खाना  है  ।

मैं इक  तरफ  हूँ किसी  कुंज-ए-कम-नुमाई में
और  एक  सम्त  जहाँ-दारी-ए-जमाना है  ।

ये  ताएरों  की  कतारें किधर  को  जाती  हैं
न  कोई दाम  बिछा  है कहीं   न  दाना  है  ।

अभी  नहीं है मुझे मस्लहत  की धूप का खौफ
अभी  तो  सर  पे  बगावत  का शामियाना  है  ।

मेरी  गजल  में रजज़ की है  घन-गरज  तो  क्या
सुखन-वरी  भी  तो  कार-ए-सिपाहियाना है  ।

****

अना = स्वाभिमान

ताजियाना = चाबुक ,  कोड़े लगाने  की  सजा

नुमाई = प्रदर्शन, दिखाना

जहांदारी = शहंशाही

ताएरों = पक्षियों

दाम = जाल

मस्लहत = परामर्श ,  सलाह

रजज़ = वंश-गौरव

सुखनवरी = शायरी

कार-ए-सिपाहियाना =  सिपाहियों की  तरह  का काम


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