Posted by: PRIYANKAR | फ़रवरी 13, 2010

बतूता का जूता

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक कविता

 

 बतूता का जूता

इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में

 
कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता

 
उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में।

****


Responses

  1. प्रियंकर भाई बहुत पहले किसी बच्चों की पत्रिका में भी छपी थी यह कविता । हो सकता है गुलज़ार ने इससे पेरित होकर ही लिखा हो । अब ऐसे विषयों पर तो कोई भी लिख सकता है ना ?

  2. इसके गुलजार एडिशन ने तो कहर ढाया है इन दिनों ।
    प्रस्तुति का आभार ।

  3. बेहतर…
    इसकी प्रस्तुति जरूरी थी…

  4. मेरी पत्नीजी बता रही थीं कि इस कविता के स्वामित्व को ले कर कोट कचहरी हो रहा है।

  5. गुलज़ार के गाने से इसका सम्बन्ध ‘दूर की कौड़ी’ जैसा ही है. दोनों चीज़ें बेहद जुदा हैं. व्यर्थ का विवाद हो रहा है.

  6. गुलज़ार उन तीन हिन्दी कवियों में से एक हैं जिनसे मैं सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ, अटूट प्रशंसक हूँ उनका। सर्वेश्वरदयाल जी का भी प्रगाढ़ प्रशंसक हूँ। मगर यह नहीं सोचा था कि जूते को लेकर इतनी सजगता देखने को मिलेगी। आभार प्रियंकर जी! मगर यह बात तो तय है कि इस मामले से न कुछ गुलज़ार साहब को लेना-देना है न सक्सेना जी को। झगड़े की जड़ है ये इब्न-बतूता। अगर ये जूता पहनता था तो इसका जूता चुर्रर्रर्रर्र…करता था या नहीं इस बात की छानबीन ज़रूरी है। अपने यहाँ पदत्राण को शिरत्राण बनाने की परम्परा का जनतांत्रिक प्रादेशिक सभाओं में विधान तो है ही, मामला कहीं संसद तक पहुँच गया तो जूतियों में क्या बँटेगा, अन्दाज़ भी नहीं लगा सकते हम लोग क्योंकि दाल तो अब बाँटने लायक चीज़ रही नहीं इस महँगाई में… और फिर कहाँ-कहाँ चुर्रर्रर्र सुनाई देगा… बस सोच के ही रह जाते हैं। इब्न-बतूता पर हो सके तो मकोका लगवा दिया जाय।


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