Posted by: PRIYANKAR | सितम्बर 12, 2007

नया साल

Shailendra 

शैलेन्द्र की एक कविता

 

नया साल

 

देर रात पटाखे छूटे

टकराए जाम से जाम

 

चुंबनों के दौर चले

थिरके कई-कई पांव

 

चहल-पहल जारी रही

लगे जिस्मों के दाम

 

बड़े-बड़े सट्टे लगे

फिटे साहब-बीबी-गुलाम

 

दुल्हन-सी सजी रात का किस्सा

इस तरह हुआ तमाम !

 

******

 

कवि परिचय : जनसत्ता के कोलकाता संस्करण के प्रभारी सम्पादक . तीन काव्य संकलन प्रकाशित .

 


Responses

  1. साल के अंत की तैयारी अभी से!


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