Posted by: PRIYANKAR | अप्रैल 8, 2009

भाई मेरे घर साथ न ले

मुहम्मद अल्वी की एक और गज़ल

 

भाई मिरे घर साथ न ले
जंगल में डर साथ न ले

भीगी आंखें    छोड़ यहीं !
देख ये मंजर साथ न ले

यादें    पत्थर    होती हैं
मूरख पत्थर साथ न ले

नींद    यहीं     रह जानी है
तकिया चादर साथ न ले

चुल्लू भर पानी के लिए
सात समंदर साथ न ले

एक अकेला भाग निकल
सारा लश्कर साथ न ले

साथ खुदा को    रख    ’अल्वी’
मस्जिद मिम्बर साथ न ले ।

*****

(वाग्देवी प्रकाशन,बीकानेर द्वारा प्रकाशित संकलन से साभार)


Responses

  1. चुल्लू भर पानी के लिए
    सात समंदर साथ न ले

    आपके कारण इतनी अच्छी गज़ल पढ़ने मिल रही है ….बहुत आभार

  2. साथ खुदा को रख ’अल्वी’
    मस्जिद मिम्बर साथ न ले ।

    पहले इसे पढ़ा हुआ है.पर छोटी बहर की ये गजल यहाँ देख अच्छा लगा

  3. सुंदर कविता, मोह त्याग का मार्ग दिखाती।

  4. इक इक लाइन में वजन है. सुन्दर.

  5. बहुत ही बढिया लिखा … बधाई।

  6. अच्छी लेखनी हे / पड़कर बहुत खुशी हुई / आप जो हिन्दी मे टाइप करने केलिए कौनसी टूल यूज़ करते हे…? रीसेंट्ली मे यूज़र फ्रेंड्ली इंडियन लॅंग्वेज टाइपिंग टूल केलिए सर्च कर रहा ता, तो मूज़े मिला ” क्विलपॅड ” / आप भी ” क्विलपॅड ” यूज़ करते हे क्या…? http://www.quillpad.in

  7. rehane do ghavo ko yu hi..
    uthane toh dard reh reh kar
    mat pocho ansuo ko behane se
    behane do ansso dhara ban kar .
    yahi hausala dega tumko ladane ka,
    tab shayad kahi phir se
    tum chal sakoge tan kar .


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