अनहद नाद

May 14, 2008

लाओ अपना हाथ

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:02 am

ठ??ानीप्रसाद मिश्र

भवानी भाई की एक कविता

 

लाओ अपना हाथ

 

लाओ अपना हाथ मेरे हाथ में दो

नए क्षितिजों तक चलेंगे

 

हाथ में हाथ डालकर

सूरज से मिलेंगे

 

इसके पहले भी

चला हूं लेकर हाथ में हाथ

मगर वे हाथ

किरनों के थे फूलों के थे

सावन के

सरितामय कूलों के थे

 

तुम्हारे हाथ

उनसे नए हैं अलग हैं

एक अलग तरह से ज्यादा सजग हैं

वे उन सबसे नए हैं

सख्त हैं तकलीफ़देह हैं

जवान हैं

 

मैं तुम्हारे हाथ

अपने हाथों में लेना चाहता हूं

नए क्षितिज

तुम्हें देना चाहता हूं

खुद पाना चाहता हूं

 

तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेकर

मैं सब जगह जाना चाहता हूं !

दो अपना हाथ मेरे हाथ में

नए क्षितिजों तक  चलेंगे

साथ-साथ सूरज से मिलेंगे !

 

*****

 

May 13, 2008

सीता को देखे सारा गांव

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:32 am

मशहूर पाकिस्तानी शायरा ज़हरा निगाह की एक कविता

 

बनवास

 

सीता को देखे   सारा गांव

आग पे कैसे धरेगी   पांव

बच जाए तो   देवी मां है

जल जाए  तो   पापन

जिसका रूप जगत को ठंडक

अग्नी उसका दर्पन ?

 

सब जो चाहें सोचें समझें

लेकिन वो भगवान

वो तो खोट-कपट के बैरी

वो तो नहीं  नादान !

 

अग्नी पार उतर के सीता

जीत गई विश्वास

देखा दोनों हाथ बढाए

राम खड़े थे पास

उस दिन से संगत में आया

सचमुच का बनवास

 

*****

 

May 8, 2008

रजधानी की धज

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:39 am

देवव्रत जोशी का एक गीत/नवगीत

 

रजधानी की धज

 

भूपालों के नगर गए हम

हमने सुने   राग दरबारी ।

 

जाजम पर  हमको  बैठाया

सारा कर्ज़   माफ़ फ़रमाया

फिर वे लगे नाचने खुद ही –

अपनी छवि होते बलिहारी ।

 

देखे   सत्ता के   गलियारे

कागज के मुख  होते कारे

जन  तिनके-सा उड़ता दीखा

रजधानी की  धज ही न्यारी ।

 

******

 

( वागर्थ के जनवरी २००२ अंक से साभार )

 

May 7, 2008

एक कविता पोस्टर

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:42 am

kavitaa poster

 

( समकालीन सृजन के भवानी भाई पर केन्द्रित अंक ‘भवानी प्रसाद मिश्र के आयाम’ के सम्पादक श्री लक्ष्मण केडिया के सौजन्य से प्राप्त )

May 6, 2008

कुंभनदास गए रजधानी

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:35 am

देवव्रत जोशी का एक गीत/नवगीत

 

कुंभनदास

 

कुंभनदास गए रजधानी ।

 

खूब लिखा औ नाम कमाया

दाम नहीं   जीवन में   पाया

राजाजी   ने   अब  बुलवाया

भारी मन, जाने की ठानी ।

 

कुंभन   पहुंचे   पैयां-पैयां

देखा   चोखा     रूप-रुपैया

लेकिन कहां आ गए भैया

यहां नहीं मिलता  गुड़-धानी ।

 

‘धत्तेरे की’  कह कर   लौटे

लोग यहां के सिक्के खोटे

बिन पैंदे के  हैं सब लोटे

जमना है पर खारा पानी ।

 

*****

 

( वागर्थ के जनवरी २००२ अंक से साभार )

 

May 5, 2008

कभी कभी मैं तुमसे भी झूठ बोलता हूं

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 9:26 am

रतन बिश्वास की बांग्ला कविता

 

सफ़ेद झूठ

 

कभी कभी मैं तुमसे भी झूठ बोलता हूं

 

जिसने पहली बार झूठ बोला होगा

शायद वह भी एक कवि था

प्रश्न यह नहीं है कि पहला झूठ किसी

पुरुष ने बोला  या नारी ने

बल्कि यह सवाल अवश्य उठ सकता है

कि पहला झूठ क्षुधा के लिए था, प्रेम के लिए या डींग हांकने के लिए

एक बाघ से मुठभेड़ का बखान था या किसी नये फल वाले जंगल की खोज

या सिर्फ़ आग या चक्के जैसा मनुष्य का एक और आदिम आविष्कार

यह सफ़ेद झूठ

 

पर लोग बदलते गए कौए के घोंसले से नन्हीं कोयल की मां को पहली पुकार देखकर

प्रकृति में पेड़-पौधों और प्राणियों के कैमोफ़्लेज़ से पुलकित

तरह तरह के छद्मावरण ……

 

*******

 

हवा ४९ पत्रिका के ‘अधुनांतिक बांग्ला कविता’ अंक से साभार,बांग्ला से अनुवाद : प्रियंकर )

 

May 2, 2008

स्वागत में

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 8:56 am

ठ??ानीप्रसाद मिश्र

       (  1913-1985 )

वानीप्रसाद मिश्र की एक कविता

 

स्वागत में

 

 मन में

जगह है जितनी

 

उस सब में मैंने

फूल की

पंखुरियां

बिछा दी हैं यों

 

कि जो कुछ

मन में आए

 

मन उसे

फूल की पंखुरियों पर

सुलाए !

 

****

 

May 1, 2008

धूप

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 11:01 am

जितेन्द्र श्रीवास्तव की एक कविता

 

धूप

 

धूप किताबों के ऊपर है

या

भीतर कहीं उसमें

कहना

मुश्किल है इस समय

 

इस समय मुश्किल है

कहना

कि किताबें नहा रही हैं धूप में

या धूप किताबों में 

 

पर यह देखना और महसूसना

नहीं मुश्किल

कि मुस्कुरा रही हैं किताबें

धूप की तरह

और धूप गरमा रही है

किताबों की तरह ।

 

*****

 

April 30, 2008

कुछेक कवि बगैर पैसे के डॉक्टरी कर रहे हैं

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:37 am

नवारुण भट्टाचार्य की एक बांग्ला कविता

 (हिंदी अनुवाद : अरविंद चतुर्वेद)

 

क्रांति के बिम्ब

 

कुछेक कवि बगैर पैसे के डॉक्टरी कर रहे हैं

चांद पर छलांग लगाने से पहले प्रेमी गिरफ़्तार

पुलिस की गाड़ियां चौबीस घंटे के भीतर

स्कूल-बसों में तब्दील कर दी जाएंगी

 

आधी रात को जनविरोधी पार्टियों की लाइन

उखाड़ फेंकी जा रही है

 

लेटरबॉक्स में चिड़ियों के घोंसला बना लेने से काम ठप

किसी सिद्धांतकार ने एक्वेरियम में बिल्ली पाली है

रेडियो कोई नहीं बजाता क्योंकि नेताओं के भाषण सुनना

अच्छा नहीं लग रहा है

 

बहस हो रही है पौधों और नन्हीं मछलियों पर

उदास संगीत के प्रभाव को लेकर

 

अब आंसुओं से ही चलेंगी मोटर गाड़ियां

मजदूरों का नाटक करने वाले मजदूरों के हाथों परेशान

कौन कह सकता है समस्या नहीं है हमारी इस नई व्यवस्था में

क्या ऐसा ही लगता है समाचार सुनने के बाद ?

 

*******

 

( समीर रायचौधुरी द्वारा सम्पादित पत्रिका  हवा ४९  के ‘अधुनांतिक बांग्ला कविता’ अंक से साभार)

 

April 25, 2008

भोर का तारा

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 11:39 am

मानिक बच्छावत की एक कविता

 

भोर का तारा

 

यह नीला आसमान है

और दूर कहीं उगा है

वह तारा

भोर होने में अभी देर है

तेजस्वी लग रहा है वह तारा

 

पूरब से छिटक रहा है उजाला

और नीला आसमान झिलमिलाने लगा है

सूर्य के स्वागत में

 

सूर्य निकलेगा

थोड़ी देर में पूरा आसमान

भर जाएगा गर्म उजाले से

तारा खो जाएगा

 

लेकिन सांझ के बाद

जब थका-हारा सूर्य सो जाएगा

उसे जगाने आएगा

भोर का यही तेजस्वी तारा ।

 

*******

 

( काव्य संकलन ‘पीड़ित चेहरों का मर्म’ से साभार )

 

Older Posts »

Blog at WordPress.com.