Posted by: PRIYANKAR | July 2, 2009

कृतज्ञ हूं मैं ….

प्रियंकर की एक कविता

 

कृतज्ञ हूं मैं

कृतज्ञ हूं मैं
जैसे आसमान की कृतज्ञ है पृथ्वी
जैसे पृथ्वी का कृतज्ञ है किसान

कृतज्ञ हूं मैं
जैसे सागर का कृतज्ञ है बादल
जैसे नए जीवन के लिए
बादल का आभारी है नन्हा बिरवा

कृतज्ञ हूं मैं
जिस तरह कृतज्ञ होता है अपने में डूबा ध्रुपदिया
सात सुरों के प्रति
जैसे सात सुर कृतज्ञ हैं
सात हज़ार वर्षों की काल-यात्रा के

कृतज्ञ हूं मैं
जैसे  सभ्यताएं कृतज्ञ हैं नदी के प्रति
जैसे मनुष्य कृतज्ञ है अपनी उस रचना के प्रति
जिसे उसने ईश्वर नाम दिया है .

****

ज्ञानदत्त  जी के आदेश पर कोलकाता के हमारे अत्यंत प्रिय वरिष्ठ कवि-गीतकार दादा छविनाथ मिश्र  का एक और ऋचागीत प्रस्तुत है,  जल की अभ्यर्थना का गीत :

 

( शं नो देवीर अभिष्टय

आपो भवन्तु पीतये ।

शं योर अभिस्रवन्तु नः )

– ऋग्वेद संहिता : १०/९/४

 

पृथ्वी का सुस्वादु सुअमृत
 

 

 

जल ज्योतिर्मय वह आंचल है

जहां खिला

यह सृष्टि-कमल है

जल ही जीवन का सम्बल है

 

आपोमयं जगत यह सारा

यही प्राणमय अन्तर्धारा

पृथिवी का सुस्वादु सुअमृत

औषधियों में नित्य निर्झरित

अग्नि-सोममय रस उज्ज्वल है

 

हरीतिमा से नित्य ऊर्मिला

हो वसुंधरा सुजला सुफला

देवि, दृष्टि दो सुषम सुमंगल

दूर करो तुम अ-सुख-अमंगल

परस तुम्हारा गंगाजल है

 

जल के बिना सभी कुछ सूना

मोती-मानुष चंदन-चूना

देवितमे मा जलधाराओ

गगन गुहा से रस बरसाओ

वह रस शिवतम

ऊर्जस्वल है

ऋतच्छन्द का बिम्ब विमल है

जल ही जीवन का सम्बल है ।

 

*****

 

(वैदिक ऋचाओं के गीतान्तरण ’श्रुति सुगन्ध’ से साभार)

वैदिक ऋचा का गीतान्तरण
 
 
 ( मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः ।

माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः

मधु नक्तमुतोषसो मधुमत पार्थिवं रजः ।

मधु द्यौरस्तु नः पिता

मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमान्नस्तु सूर्यः ।

माध्वीर्गावो भवन्तु नः )

– ऋक संहिता : १/९०/६-७-८

 

हवा चले मधुवन्ती
छविनाथ मिश्र

 

हम सबका

जीवन मधुमय हो

 

सारी नदियां मधु बिखराएं हवा चले मधुवन्ती

दिशा-दिशा मधु रस बरसाए

ओषधि हो मधुवन्ती

हम सब का

यौवन मधुमय हो

 

मधुमय हो प्रत्यूष हमारा रातें हों मधुवन्ती

अन्तरिक्ष मधुमान मधुर हो

धरती मां मधुवन्ती

व्योम-पिता का

मन मधुमय हो

 

मधुमय सरस वनस्पति भी हो और सूर्य मधुवर्षी

मधुमय हो गोयूथ मुखर हों

किरणें नवरसवर्षी

हम सब का

आंगन मधुमय हो ।

 

****

 

( संग्रह श्रुति सुगंध से साभार )

 

sethiya

 

 

 

 

 

 

 

कन्हैयालाल सेठिया (1919-2008)

( विरल ही किसी कवि के गीत को वह मान्यता मिलती है जिसके तहत एक पूरा का पूरा जन-समुदाय  उसे अपनी अस्मिता — अपनी पहचान — से जोड़कर देखने लगे . राजस्थानी और हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि कन्हैयालाल सेठिया का यह गीत ऐसा ही एक कालजयी गीत है .  अगर इसे  राजस्थानी उप-राष्ट्रीयता का अघोषित राष्ट्रगीत कहा जाए तो अनुचित न होगा .  आप भी इसे   पढ़ें-सुनें और आनन्दित हों  )

धरती धोरां री !

 

धरती धोरां री !

आ तो सुरगां नै सरमावै
ईं पर देव रमण नै आवै
ईं रो जस नर नारी गावै
               धरती धोरां री !

सूरज कण कण नै चमकावै
चन्दो इमरत रस     बरसावै
तारा निछरावल कर   ज्यावै
                  धरती धोरां री !

काळा बादलिया घहरावै
बिरखा घूघरिया घमकावै
बिजली डरती ओला खावै
                धरती धोरां री !

लुळ लुळ बाजरियो लैरावै
मक्की झालो दे’र बुलावै
कुदरत दोन्यूं हाथ लुटावै
              धरती धोरां री !

पंछी मधरा मधरा    बोलै
मिसरी मीठै सुर स्यूं घोलै
झीणूं बायरियो     पंपोळै
                 धरती धोरां री !

नारा नागौरी हिद    ताता
मदुआ ऊंट अणूंता खाथा !
ईं रै    घोड़ां री     के बातां ?
                  धरती धोरां री !

ईं रा फल फुलड़ा मन भावण
ईं रै    धीणो     आंगण आंगण
बाजै सगळां स्यूं   बड़ भागण
                      धरती धोरां री !

ईं रो    चित्तौड़ो गढ़    लूंठो
ओ तो रण वीरां रो खूंटो
ईं  रो    जोधाणूं     नौ कूंटो
              धरती धोरां री !

आबू    आभै रै    परवाणै
लूणी    गंगाजी ही जाणै
ऊभो जयसलमेर सिंवाणै
               धरती धोरां री !

ईं रो    बीकाणूं     गरबीलो
ईं रो अलवर जबर हठीलो
ईं रो   अजयमेर    भड़कीलो
                 धरती धोरां री !

जैपर नगरयां में पटराणी,
कोटा बूंटी कद अणजाणी ?
चम्बल कैवै   आं री का’णी
                 धरती धोरां री !

कोनी नांव भरतपुर छोटो
घूम्यो सुरजमल रो   घोटो
खाई    मात फिरंगी   मोटो
              धरती धोरां री !

ईं स्यूं नहीं माळवो न्यारो
मोबी   हरियाणो है     प्यारो
मिलतो तीन्यां रो उणियारो
                  धरती धोरां री !

ईडर पालनपुर   है    ईं रा
सागी जामण जाया बीरा
ऐ तो टुकड़ा मरू रै जी रा
                धरती धोरां री !

सोरठ बंध्यो सोरठां लारै
भेळप सिंध आप    हंकारै
मूमल बिसरयो हेत चितारै
                  धरती धोरां री !

ईं पर तनड़ो मनड़ो वारां
ईं पर जीवण प्राण उवारां
ईं री धजा उडै गिगनारां
              धरती धोरां री !

ईं नै मोत्यां थाल बधावां
ईं री धूल लिलाड़ लगावां
ईं रो    मोटो भाग    सरावां
                धरती धोरां री !

ईं रै सत री आण निभावां
ईं रै    पत नै नहीं    लजावां
ईं नै     माथो भेंट     चढ़ावां
                  मायड़ कोड़ां री
                धरती धोरां री !

*****

इस गीत को सुनने के लिए क्लिक करें :   धरती धोरां री ………

Posted by: PRIYANKAR | June 5, 2009

गर्जन-तर्जन

 

Manik Bachhawat

Manik Bachhawat

मानिक बच्छावत की एक कविता

 

 

 

गर्जन-तर्जन

 

बहुत जोर से

बोले थे तुम

गरजे थे तुम

बरसे थे तुम

 

फिर तुम रुके

तुमने देखा

जहां तुम खड़े थे

वहीं तुम खड़े थे

 

कहीं कुछ नहीं हुआ

तुम्हारी बातों ने

किसी को नहीं छुआ ।

 

*****

(काव्य संकलन ’पीड़ित चेहरों का मर्म’ से साभार)

(1861-1941)

रवीन्द्रनाथ ठाकुर का एक गीत

(बांग्ला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल)

 

मरण आएगा जिस दिन द्वार

 

मरण आएगा जिस दिन द्वार

उसे तुम दोगे क्या उपहार ।

 

रखूंगा उसके सम्मुख आन

कि, छलछल करते अपने प्राण

विदा में दूंगा उस पर वार –

मरण आएगा जिस दिन द्वार !

 

शरत अनगिन वसंत दिन-रात

कई   संध्याएं,  कई   प्रभात

भरे जीवन-घट में   रस कई

फूल-फल कितने ही तो फले

दुःख-सुख की छाया में    पले

हृदय में, मेरे वे आ मिले ।

सभी जो मेरा    संचित धन

दिनों के सारे    आयोजन –

सजा दूंगा उसके    सम्मुख

अरे ये अपने सब    उपहार !

 

मरण आएगा जिस दिन द्वार !

 

*****

( गीतांजलि से )

प्रार्थना : गुरु कबीरदास के लिए

परम गुरु
दो तो ऐसी विनम्रता दो
कि अंतहीन सहानुभूति की वाणी बोल सकूँ
और यह अंतहीन सहानुभूति
पाखंड न लगे ।

दो तो ऐसा कलेजा दो
कि अपमान, महत्वाकांक्षा और भूख
की गांठों में मरोड़े हुए
उन लोगों का माथा सहला सकूँ
और इसका डर न लगे
कि कोई हाथ ही काट खायेगा ।

दो तो ऐसी निरीहता दो
कि इस दहाड़ते आतंक के बीच
फटकार कर सच बोल सकूँ
और इसकी चिन्ता न हो
कि इस बहुमुखी युद्ध में
मेरे सच का इस्तेमाल
कौन अपने पक्ष में करेगा ।

यह भी न दो
तो इतना ही दो
कि बिना मरे चुप रह सकूँ ।

****

 

 

(1927-1983)

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक कविता

 

 तुम्हारे साथ रहकर

 

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है
कि दिशाएँ पास आ गयी हैं
हर रास्ता छोटा हो गया है
दुनिया सिमटकर
एक आँगन-सी बन गयी है
जो खचाखच भरा है
कहीं भी एकान्त नहीं
न बाहर, न भीतर ।

 
हर चीज़ का आकार घट गया है
पेड़ इतने छोटे हो गये हैं
कि मैं उनके शीश पर हाथ रख
आशीष दे सकता हूँ
आकाश छाती से टकराता है
मैं जब चाहूँ बादलों में मुँह छिपा सकता हूँ ।

 
तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे महसूस हुआ है
कि हर बात का एक मतलब होता है
यहाँ तक की घास के हिलने का भी
हवा का खिड़की से आने का
और धूप का दीवार पर
चढ़कर चले जाने का ।

 
तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
सम्भावनाओं से घिरे हैं
हर दीवार में द्वार बन सकता है
और हर द्वार से पूरा का पूरा
पहाड़ गुज़र सकता है ।

 
शक्ति अगर सीमित है
तो हर चीज़ अशक्त भी है
भुजाएँ अगर छोटी हैं
तो सागर भी सिमटा हुआ है
सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है
जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है
वह नियति की नहीं     मेरी है ।

*****

Posted by: PRIYANKAR | May 8, 2009

अपनी पीढी़ के लिए

 

अरुण कमल

अरुण कमल

 

 

अरुण कमल की एक कविता

 

 अपनी पीढी के लिए

 

वे सारे खीरे जिनमें तीतापन है हमारे लिए
वे सब केले जो जुड़वां हैं
वे आम जो बाहर से पके पर भीतर खट्टे हैं चूक
और तवे पर सिंकती पिछली रोटी परथन की
सब हमारे लिए
ईसा की बीसवीं शाताब्‍दी की अंतिम पीढी के लिए
वे सारे युद्ध और तबाहियां
मेला उखडने के बाद का कचडा    महामारियां
समुद्र में डूबता सबसे प्राचीन बंदरगाह
और टूट कर गिरता सर्वोच्‍च शिखर
सब हमारे लिए
पोलिथिन थैलियों पर जीवित गौवों का दूध हमारे लिए
शहद का छत्‍ता खाली                                                                                                                 हमारे लिए वो हवा फेफड़े की    अंतिम मस्‍तकहीन धड़
पूर्वजों के सारे रोग हमारे रक्‍त में
वे तारे भी हमारे लिए जिनका प्रकाश अब त‍क पहुंचा ही नहीं हमारे पास
और वे तेरह सूर्य जो कहीं होंगे आज भी सुबह की प्रतीक्षा में
सबसे सुंदर स्त्रियां और सबसे सुंदर पुरूष
और वो फूल जिसे मना है बदलना फल में
हमारी ही थाली में शासकों के दांत छूटे हुए
और जरा सी धूप में धधक उठती आदिम हिंसा

जब भी हमारा जिक्र हो कहा जाए
हम उस समय जिए जब
सबसे आसान था चंद्रमा पर घर
और सबसे मोहाल थी रोटी
और कहा जाए
हर पीढी़ की तरह हमें भी लगा
कि हमारे पहले अच्‍छा था सब कुछ
और आगे सब अच्‍छा होगा ।

 

*****

Posted by: PRIYANKAR | May 7, 2009

बीज व्यथा

ज्ञानेन्द्रपति की एक कविता

 

 बीज व्यथा

 

वे बीज

जो बखारी में बन्द

कुठलों में सहेजे

हण्डियों में जुगोए

दिनोंदिन सूखते देखते थे मेघ-स्वप्न

चिलकती दुपहरिया में

उठँगी देह की मुं‍दी आँखों से

उनींदे गेह के अनमुँद गोखों से

निकलकर

खेतों में पीली तितलियों की तरह मँडराते थे

वे बीज– अनन्य अन्नों के एकल बीज

अनादि जीवन-परम्परा के अन्तिम वंशज

भारतभूमि के अन्नमय कोश के मधुमय प्राण

तितलियों की तरह ही मार दिये गये

मरी पूरबी तितलियों की तरह ही

नायाब नमूनों की तरह जतन से सँजो रखे गये हैं वे

वहाँ– सुदूर पच्छिम के जीन-बैंक में

बीज-संग्रहालय में

 

सुदूर पच्छिम जो उतना दूर भी नहीं है

बस उतना ही जितना निवाले से मुँह

सुदूर पच्छिम जो पुरातन मायावी स्वर्ग का है अधुनातन प्रतिरूप

नन्दनवन अनिन्द्य

जहाँ से निकलकर

आते हैं वे पुष्ट-दुष्ट संकर बीज

भारत के खेतों पर छा जाने

दुबले एकल भारतीय बीजों को बहियाकर

आते हैं वे आक्रान्ता बीज टिड्डी दलों की तरह छाते आकाश

भूमि को अँधारते

यहाँ की मिट्टी में जड़ें जमाने

फैलने-फूलने

रासायनिक खादों और कीटनाशकों के जहरीले संयंत्रों की

आयातित तकनीक आती है पीछे-पीछे

तुम्हारा घर उजाड़कर अपना घर भरनेवाली आयातित तकनीक

यहाँ के अन्न-जल में जहर भरनेवाली

जहर भरनेवाली शिशुमुख से लगी माँ की छाती के अमृतोपम दूध तक

क़हर ढानेवाली बग़ैर कुहराम

 

वे बीज

भारतभूमि के अद्भुत जीवन-स्फुलिंग

अन्नात्मा अनन्य

जो यहाँ बस बहुत बूढ़े किसानों की स्मृति में ही बचे हुए हैं

दिनोदिन धुँधलाते–  दूर से दूरतर

खोए जाते निर्जल अतीत में

जाते-जाते हमें सजल आँखों से देखते हैं

कि हों हमारी भी आँखें सजल

कि उन्हें बस अँजुरी-भर ही जल चाहिए था जीते जी सिंचन के लिए

और अब तर्पण के लिए

बस अँजुरी-भर ही जल

 

वे नहीं हैं आधुनिक पुष्ट-दुष्ट संकर बीज–

क्रीम-पाउडर की तरह देह में रासायनिक खाद-कीटनाशक मले

बड़े-बड़े बाँधों के डुबाँव जल के बाथ-टब में नहाते लहलहे ।

 

*****

( काव्य संग्रह ‘संशयात्मा‘ से साभार )

Older Posts »

Categories