Posted by: PRIYANKAR | नवम्बर 5, 2011

आलोक धन्वा की एक कविता

 आलोक धन्वा की एक कविता

जिलाधीश

तुम एक पिछड़े हुए वक्ता हो

तुम एक ऐसे विरोध की भाषा में बोलते हो
जैसे राजाओं का विरोध कर रहे हो
एक ऐसे समय की भाषा जब संसद का जन्म नहीं हुआ था

तुम क्या सोचते हो
संसद ने विरोध की भाषा और सामग्री को वैसा ही रहने दिया है
जैसी वह राजाओं के ज़माने में थी

यह जो आदमी
मेज़ की दूसरी ओर सुन रहा है तुम्हें
कितने करीब और ध्यान से
यह राजा नहीं जिलाधीश है !

यह जिलाधीश है
जो राजाओं से आम तौर पर
बहुत ज़्यादा शिक्षित है
राजाओं से ज़्यादा तत्पर और संलग्न !

यह दूर किसी किले में —  ऐश्वर्य की निर्जनता में नहीं
हमारी गलियों में पैदा हुआ एक लड़का है
यह हमारी असफलताओं और गलतियों के बीच पला है
यह जानता है हमारे साहस और लालच को
राजाओं से बहुत ज़्यादा धैर्य और चिन्ता है इसके पास

यह ज़्यादा भ्रम पैदा कर सकता है
यह ज़्यादा अच्छी तरह हमें आजादी से दूर रख सकता है
कड़ी
कड़ी निगरानी चाहिए
सरकार के इस बेहतरीन दिमाग पर !

कभी-कभी तो इससे सीखना भी पड़ सकता है !

****

Posted by: PRIYANKAR | नवम्बर 1, 2011

मोहन श्रोत्रिय की एक कविता

 

 

 

 

 

हमारे समय की प्रार्थनाएं 

नदियो !
तुम यों ही बहती रहो 
धरती को सींचती हरा-भरा 
करती 
मनुष्‍यों और शेष 
जीव जगत के जीवन को 
सुनिश्चित करती। 

पर्वतो !
तुम यों ही अड़े रहो
विविधतामय वन‍स्‍पति को 
धारण करते हुए 
बादलों से मित्रता को पुख्‍़ता रखते हुए। 

बादलो !
तुम गरजो चाहे जितना भी 
बरसते रहो 
इतना-भर ज़रूर कि 
ताल-तलैया लबालब रहें 
कुएं ज्‍़यादा लंबी रस्‍सी 
की मांग न करें। 

सूर्य !
तुम प्रकाश और ऊष्‍मा का 
संचार करते रहो
धरती को हरा-भरा रखो 
फूलों को खिलाओ 
उन्‍हें रंग दो- गंध दो 
और फलों को रस से 
मालामाल करते रहो। 

धरती मां !
हमें धारण करती रहो 
पर हां हमें 
तुम्‍हारे लायक़ यानि 
बेहतर मनुष्‍य 
बनते चले जाने को 
प्रेरित करती रहो 
कभी-कभी दंडित भी करो 
लेकिन प्‍यार बांटती रहो 
अबाध और अनवरत 
हमारी अंजुरि ख़ाली न रहे। 

और समुद्र !
तुम 
निरंतर उथले 
होते जा रहे 
हम मनुष्‍यों को 
थोड़ी अपनी गहराई 
देते चलो।

****

Posted by: PRIYANKAR | अक्टूबर 23, 2011

तोमास त्रांसत्रोमर की एक कविता

तोमास त्रान्सत्रोमर

एक मौत के बाद

पहले वहाँ एक सदमा था
जिसने पीछे छोड़ दी थी एक लंबी, झिलमिलाती पूँछ पुच्छलतारे की
यह हमें रखती है ‍अंतर्मुखी, बना देती है टीवी की तस्वीरों को बर्फ की तरह सर्द
यह जम जाती है टेलीफोन के तारों की ठंडी बूँदों में
शीत की धूप में अब भी की जा सकती है स्की धीरे-धीरे
ब्रश के माध्यम से जहाँ कुछ पत्तियाँ लटकी हैं
वे लगती हैं जैसे पुरानी टेलीफोन निर्देशिकाओं के फटे पन्ने
नाम जिन्हें ठंड ने निगल लिया है
दिल की धड़कन सुनना अब भी कितना सुंदर है
पर अकसर परछाईं शरीर की तुलना में अधिक सच लगती है
समुराई पिद्दी-सा लग रहा है
काले अजगर जैसे शल्कवाले अपने कवच के बगल में ।

*****

हिंदी अनुवाद : प्रियंकर पालीवाल

Posted by: PRIYANKAR | अक्टूबर 20, 2011

तोमास त्रांसत्रोमर की एक कविता

अप्रैल और मौन

वसंत परित्यक्त पड़ा है
वेलवेट-सी काली खाई
बिना किसी सोच-विचार के मेरे नजदीक रेंग रही है
चमकते दिख रहे हैं तो
सिर्फ पीले फूल
ले जाया जा रहा हूँ मैं अपनी परछाईं में
जैसे काले डिब्बे में वॉयलिन
जो मैं कहना चाहता हूँ सिर्फ वह बात
झलक रही है पहुँच से दूर
जैसे चमकती है चाँदी
सूदखोर की दुकान में ।

*****

हिंदी अनुवाद : प्रियंकर पालीवाल

Posted by: PRIYANKAR | अगस्त 3, 2011

फ़रीद खां की एक कविता

निकाह की मुबारकबाद के साथ प्रस्तुत है सद्यविवाहित युवा कवि फ़रीद खां की एक कविता :

दादा जी साइकिल वाले

मैं ज्यों ज्यों बड़ा होता गया
मेरी साइकिल की ऊंचाई भी बढ़ती गई
और उन सभी साइकिलों को कसा था
पटना कॉलेज के सामने वाले ’दादा जी साइकिल वाले’ नाना ने

अशोक राजपथ पर दौड़ती, चलती, रेंगती

ज़्यादातर साइकिलें उनके हाथों से ही कसी थीं

पूरा पटना ही जैसे उनके चक्के पर चल रहा था
हाँफ रहा था
गंतव्य तक पहुँच रहा था

वहाँ से गुज़रने वाले सभी, वहाँ एक बार रुकते ज़रूर थे
सत सिरी अकाल कहने के लिए
चक्के में हवा भरने के लिए
नए प्लास्टिक के हत्थे या झालर लगवाने के लिए
चाय पी कर, साँस भर कर, आगे बढ़ जाने के लिए

पछिया चले या पुरवइया
पूरी फ़िज़ा में उनके ही पंप की हवा थी

हमारे स्कूल की छुट्टी जल्दी हो गई थी
हम सबने एक साथ दादा जी की दुकान पर ब्रेक लगाया
पर दादा जी की दुकान ख़ाली हो रही थी
तक़रीबन ख़ाली हो चुकी थी
मुझे वहाँ साइकिल में लगाने वाला आईना दिखा
मुझे वह चाहिए था, मैंने उठा लिया
इधर उधर देखा तो वहाँ उनके घर का कोई नहीं था

शाम को छः बजे दूरदर्शन ने पुष्टि कर दी
कि इन्दिरा गाँधी का देहांत हो गया

चार दिन बाद स्कूल खुले और हमें घर से निकलने की इजाज़त मिली
शहर, टेढ़े हुए चक्के पर घिसट रहा था

हवा सब में कम कम थी

स्कूल खुलने पर हम सब फिर से वहाँ रुके, हमेशा की तरह
मैंने आईने का दाम चुकाना चाहा
पर दादा जी, गुरु नानक की तरह सिर झुकाए निर्विकार से बैठे थे
उनके क्लीन शेव बेटे ने मेरे सिर पर हाथ फेर कर कहा,  ’रहने दो’
एक दानवीर दान कर रहा था आईना

उसके बाद लोग अपने-अपने चक्के में हवा अलग-अलग जगह से भरवाने लगे।
उसके बाद हर गली में पचास पैसे लेकर हवा भरने वाले बैठने लगे।

****

Posted by: PRIYANKAR | जुलाई 17, 2011

अनुराग वत्स की एक कविता

अनुराग वत्स

गिनती

अब जब कहीं कुछ नहीं की साखी है तो तुम्हारा
जानबूझकर मेरे पास भूल गया क्लचर है.
मैं उससे आदतन खेलता हूँ, मगर एहतिहात से
कि कहीं तुम्हारी आवाज़ बरज ना दे.
और टूट गया तो तुम्हारी तरह वैसा ही मिलना नामुमकिन.

हुमायूँ’ज टॉम्ब, शाकुंतलम थियेटर और परांठे वाली गली
तुम साथ ले गई. अब वे मेरी याद के नक़्शे में हैं, शहर दिल्ली में कहीं नहीं.

यूथ भी.
उसे अकेले पढ़ना असंभव होगा मेरे लिए.

मेरा हरा कुर्ता हैंगर का होकर रह गया है.
मानो उसे तुम्हारे हाथों ने दुलारा ही नहीं.

आसमानी अदालत में मुझे मुजरिम करार दिया गया है.
सज़ा बरसात की सुनाई गई है…हद है!
…आगे कोई अपील नहीं…

सच पूछो तो तुम्हारा एसारके मुझे चिढ़ाता है.
हालाँकि मैं रोमन हॉलीडे चाव से देख सकता हूँ.

फिर भी मैं आजिजी में नहीं, बहुत इत्मिनान में फ्लोरेंतिनो अरिज़ा के
५३ साल, ७ महीने और ११ दिन-रात को अपना मुकम्मल ठिकाना बना रहा हूँ.
पर इतनी उम्र मिलेगी फरमीना ?

***

अनुराग वत्स की और कविताएं यहां पढ़ें :

http://vatsanurag.blogspot.com/2011/01/blog-post_27.html

अंबर रंजना पाण्डेय

कि दोष लगते देर नहीं लगती ……

किसी स्त्री की परपुरुष से इतनी
मैत्री ठीक नहीं देवि

कि दोष लगते देर नहीं लगती
न गाँठ पड़ते

मेरा क्या मैं तो किसी मुनि का
छोड़ा हुआ गौमुखी कमंडल हूँ
जो लगा कभी किसी चोर के हाथ
कभी वेश्या तो कभी किसी ढोंगी ब्रह्मण के

तुम्हारा तो अपना संसार है देवि
अन्न का भंडार है शय्या है
जल से भरा अडोल कलश धरा है
तुम्हारे चौके में
संतान है स्वामी हैं

भय नहीं तुम्हें कि रह जाऊँगा
जैसे रह
जाता है कूकर रोटी वाले गृह में

चोर हूँ तुम्हारी खिड़की से लटका
पकड़ा ही जाऊँगा
मेरा अंत निश्चित है देवि
मेरा काल देखो आ रहा है

मसान है मेरा ठिकाना
शव मेरी सेज
देखो मुझसे उठती है दुर्गन्ध
युगों जलती चिताओं की

मत लगो मेरे कंठ
मेरे कंधे पर नाग का जनेऊ
मेरे कंठ में विष है देवि ।

****

अंबर रंजना पाण्डेय की अन्य कविताएं यहां पढ़ें :

http://vatsanurag.blogspot.com/2011/05/blog-post_14.html

 1.
आम के बाग़

आम के फले हुए पेड़ों
के बाग़ में
कब जाऊँगा ?

मुझे पता है कि
अवध, दीघा और मालदह में
घने बाग़ हैं आम के
लेकिन अब कितने और
कहाँ कहाँ
अक्सर तो उनके उजड़ने की
ख़बरें आती रहती हैं ।

बचपन की रेल यात्रा में
जगह जगह दिखाई देते थे
आम के बाग़
बीसवीं सदी में

भागलपुर से नाथनगर के
बीच रेल उन दिनों जाती थी
आम के बाग़ों के बीच
दिन में गुजरो
तब भी
रेल के डब्बे भर जाते
उनके अँधेरी हरियाली
और ख़ुशबू से

हरा और दूधिया मालदह
दशहरी, सफेदा
बागपत का रटौल
डंटी के पास लाली वाले
कपूर की गंध के बीजू आम

गूदेदार आम अलग
खाने के लिए
और रस से भरे चूसने के लिए
अलग
ठंढे पानी में भिगोकर

आम खाने और चूसने
के स्वाद से भरे हैं
मेरे भी मन प्राण

हरी धरती से अभिन्न होने में
हज़ार हज़ार चीज़ें
हाथ से तोड़कर खाने की सीधे
और आग पर पका कर भी

यह जो धरती है
मिट्टी की
जिसके ज़रा नीचे नमी
शुरू होने लगती है खोदते ही !

यह जो धरती
मेढक और झींगुर
के घर जिसके भीतर
मेढक और झींगुर की
आवाज़ों से रात में गूँजने वाली

यह जो धारण किये हुए है
सुदूर जन्म से ही मुझे
हम ने भी इसे संवारा है !

यह भी उतनी ही असुरक्षित
जितना हम मनुष्य इन दिनों

आम जैसे रसीले फल के लिए
भाषा कम पड़ रही है
मेरे पास

भारतवासी होने का सौभाग्य
तो आम से भी बनता है !

2.

गाय और बछड़ा

एक भूरी गाय
अपने बछड़े के साथ
बछड़ा क़रीब एक दिन का होगा
घास के मैदान में
जो धूप से भरा है

बछड़ा भी भूरा ही है
लेकिन उसका नन्हा
गीला मुख
ज़रा सफेद

उसका पूरा शरीर ही गीला है
गाय उसे जीभ से चाट रही है

गाय थकी हुई है ज़रूर
प्रसव की पीड़ा से बाहर आई है
फिर भी
बछड़े को अपनी काली आँखों से
निहारती जाती है
और उसे चाटती जा रही है

बछड़े की आँखें उसकी माँ
से भी ज़्यादा काली हैं
अभी दुनिया की धूल से अछूती

बछड़ा खड़ा होने में लगा है
लेकिन
कमल के नाल जैसी कोमल
उसकी टाँगें
क्यों भला ले पायेंगी उसका भार !
वह आगे के पैरों से ज़ोर लगाता
है
उसके घुटने भी मुड़ रहे हैं
पहली पहली बार
ज़रा-सा उठने में गिरता
है कई बार घास पर
गाय और चरवाहा
दोनों उसे देखते हैं

सृष्टि के सबक हैं अपार
जिन्हें इस बछड़े को भी सीखना होगा
अभी तो वह आया ही है

मेरी शुभकामना
बछड़ा और उसकी माँ
दोनों की उम्र लम्बी हो

चरवाहा बछड़े को
अपनी गोद में लेकर
जा रहा है झोपड़ी में
गाय भी पीछे-पीछे दौड़ती
जा रही है।

***

Posted by: PRIYANKAR | मार्च 29, 2011

कवि सब अच्छे हैं ….

भवानीप्रसाद मिश्र की एक कविता 

 

लोग सब अच्छे हैं

कवि सब अच्छे हैं

चीज़ें सब अच्छी हैं

तुलनाएं मत करो

समझो अलग-अलग सबको

समझो अलग-अलग देखो —

स्नेह से और सहानुभूति से

एक हैं सब और अच्छे

चीज़ों की तुलना का

क्या अर्थ है

सब चीज़ें अपने-अपने ढंग से

पूरी हैं

और सब लोग

अधूरे हैं

कवि की अलग बात है

वह न चीज़ों में आता है

न लोगों में ठीक-ठीक

समाता है उस समय

जब वह लिखता होता है

जो संयोगों के अर्थों

और अभिप्रायों में पड़ा है

वह किससे छोटा है

किससे बड़ा है

एक ठीक कवि की

किसी दूसरे ठीक कवि से

तुलना मत करो

पढ़ कर उन्हें अपने को

अभी खाली करो

अभी भरो !

****

* भवानी भाई,सिवनी-मालवा में लोक सम्मान(१९७३)



विनय मजूमदार (1934-2006)

(बांग्ला से अनुवाद एवं प्रस्तुति : नीलकमल)



अकाल्पनिक

तुम्हारे भीतर आऊंगा, हे नगरी, कभी-कभी चुपचाप
बसन्त में कभी, कभी बरसात में
जब दबे हुए ईर्ष्या-द्वेष
पराजित होंगे इस क़लम के आगे
तब, जैसा कि तुमने चाहा था, एक सोने का हार भी लाऊंगा उपहार।
तुम्हारा सर्वांग ज्यों इश्तहार
यौवन के बाज़ार का, फिर भी तुम्हारे पास आकर
महसूस होता है, जैसे तुम्हारी अपनी
एक तहज़ीब है, सिर्फ़ तुम्हारी, और जो आदमी के भीतर की
चिरन्तन वृत्ति का प्रकाश भी है।
हे नगरी, महज कुछ-एक बार तुम्हारे भीतर आना
यह एहसास देता है कि जैसे तीनों-लोक में
नहीं कोई भी तुम्हारे जैसा, तुम्हारा नशा, तुम्हारी देह, तुम्हारी बातें, और तुम्हारा स्वाद है ऐसा।

****

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